Grihasth Tantra

Month: November 2025

तंत्र घटनाएं

वज्र कवच और पिशाच भाग – 02

रक्षक ने बेहुदगी से आवाज लगाकर सभी को बाहर निकलने कहा। और उल्टा सीधा बोलने लगा। बालक बस एक हुंकार के साथ उस ओर देखा जहां से अनर्गल विषय बोला जा रहा था। कुछ ही क्षणों में ना वह रक्षक चुप हो गया वरन वह वहीं बैठ गया, अब कोई उस पर ध्यान ना देकर, बालक के समक्ष हाथ जोड़कर पुनः पुछा महाराज कृपा करें हम सब आपके समक्ष कुछ भी नहीं। हम पर दया करें व बालक को मुक्त करें, इस हेतु आप अपना परिचय दें।
बालक का शरीर काफी तेज कांपने लगा , जल के मध्य वह हुंकारे व

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तंत्र घटनाएं

वज्र कवच और पिशाच

अपने सिद्ध स्थान पर हल्दी से एक छोटा सा यंत्र बनाया , उस यंत्र के ऊपर कपूर का चुरा चढ़ाया जिससे पुरा यंत्र ढक गया। यह हल्दी व कपूर‌ पूर्व अभिमंत्रित था। अब उस चावल व फुल को उसके मध्य स्थापित कर कुछ मंत्र पढ़़ना आरंभ किया। मंत्र पढ़ते कुछ समय बीता होगा, ऐसा लगा जैसे पुष्प में स्पंदन हुआ हल्का। फिर लगा चावल में हल्का स्पंदन हुआ।
सुखा हुआ पुष्प जो काला पड़ चुका था वो एकाएक गहरे रंग का होने लगा और उसी समय सोखा ने एक कपूर को दीपक से जला कर कुछ मंत्र बुदबुदाहट के साथ उस यंत्र पर डाल दिया। कपूर चुर्ण से बना वह यंत्र पुरा जल उठा

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तंत्र-स्रोत कोष

श्री कामाख्या तंत्र कवच

यस्य स्मरणमात्रेण योगिनी-डाकिनी-गणाः । राक्षस्यो विघ्नकारिण्यो याश्चान्या विघ्नकारिकाः ॥2॥
क्षुत्पिपासा तथा निद्रा तथान्ये ये च विघ्नदाः । दूरादपि पलायन्ते कवचस्य प्रसादतः ॥3॥
निर्भयो जायते मर्त्यस्तेजस्वी भैरवोपमः । समासक्तमनाश्चापि जपहोमादिकर्मसु ॥
भवेच्च मन्त्र-तन्त्राणां निर्विघ्नेन सु-सिद्धये ॥4॥
~ अथ कवचम् ~
ॐ प्राच्यां रक्षतु मे तारा कामरुप-निवासिनी । आग्नेय्यां षोडशी पातु याम्यां धूमावती स्वयम् ॥5॥
नैर्ऋत्यां भैरवी पातु वारुण्यां भुवनेश्वरी । वायव्यां सततं पातु छिन्नमस्ता महेश्वरी ॥6॥

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तंत्र-स्रोत कोष

श्री त्रिपुर सुंदरी चौंसठ योगिनी नामावली

औं विशालाक्ष्यै नमः
औं हुंकारायै नमः
औं बडवामुख्यायै नमः
औं हाहारवायै नमः
औं महाक्रूरायै नमः
औं क्रोधनायै नमः
औं भयाननायै नमः
औं सर्वज्ञायै नमः
औं तरलायै नमः
औं तारायै नमः
औं ऋग्वेदायै नमः
औं हयाननायै नमः
औं सारायै नमः
औं रससंग्राहायै नमः
औं सरवायै नमः
औं तालजङ्घ्यै नमः
औं रक्ताक्ष्यै नमः
औं करंकिन्यै नमः
औं विद्विजिह्वायै नमः

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साधना सर्वस्व

चौंसठ योगिनी विशेष

विंध्य पर्वत पर विराजमान मां भगवती महा त्रिपुर सुंदरी है वही भगवती षोडशी के रूप में भगवती कामाख्या के रूप में कामाख्या में
तंत्रोक्त रात्रिसक्त अथवा तंत्रोक्त देवी सूक्त। इन दोनों के द्वारा भगवती का प्रबोधन किया जाता है, आवाहन किया जाता है। या देवी सर्वभूतेषु शक्ति रूपेण संस्थिता – यह जो मंत्र आदि है जो कि श्री दुर्गा

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श्री रुद्रांश-वाणी

प्रकृति के मध्य तंत्र स्थान

विधान का पालन हुआ। बताये गये समय पर चिताभूमि थपर स्थित भगवती सती के हृदयपीठ पर विराजमान भगवान शिव के महा ज्योतिर्लिंग वैद्यनाथ धाम के नाग पीठ पर उनके निमित्त समस्त विधानों को पूर्ण किया गया

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