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Grihasth Tantra

तंत्र घटनाएं

वज्र कवच और पिशाच

Grihasth Tantra

प्रकृति के मध्य ऐसे शांतिपूर्ण स्थान होते हैं जहां निकृष्ट आत्माओं को भी शांति प्राप्त होती है। कभी तंत्र विद्याओं के ज्ञाताओं द्वारा उपद्रवी प्रेतों को किसी स्थान में बंधित कर दिया जाता है तो कभी भटकते हुये पिशाच ऐसे स्थानों को अपना निवास बना लेते हैं। बांसों के नये कपोलों के झुरमुठों में विभिन्न प्रकार के शुभ व अशुभ दोनों ही शक्तियों का वास स्थान बन जाता है।
यह सत्य घटना बिहार के राजगिर क्षेत्र की है। खेतों में काम करने वाले किसान परिवार ने जब अपने पुराने बांस के बगीचे को बेचने का निर्णय लिया तब उस परिवार का एक युवा खेतिहर मजदूरों के साथ स्वयं बांस काटने चला गया। दुसरे ही दिन उसकी अवस्था बहुत खराब हो गयी। अनिद्रा की स्थिति, आखें लाल सुखी हुई , तेज बुखार।
घर पर आराम कर रहे बालक की अवस्था दिन भर में अत्यधिक बिगड़ गयी। सोता तो चीखना आरंभ कर देता। पुछने पर कहता कोई गला दबाता है सांसे रुकने लगती है। चुंकी तबियत ऐसी हो गयी थी तो पहले अस्पताल ले जाया गया। वहां पानी चढ़ना आरंभ हुआ कुछ इंजेक्शन लगे लेकिन बुखार उतरने का नाम नहीं ले रहा था। गांव के लोग थे मामला समझ गये की ऊपरवार की संभावना है। उसके पिताजी पास गांव के जानकार के पास गयें व विषय बताया। जानकार अपने पुजा स्थान से कुछ चावल व फुल दिया व कहा की इसे उसके सिरहाने रात भर रखिये और सुबह लाकर मुझे दीजिए। यह कर दिया गया। रात भर बुखार आते जाते रहा वही चिखना चिल्लाना लगा रहा। कोई आराम नहीं। सुबह जब चावल व पुष्प सोखा के पास पहुंचा तो उन्होंने अपने क्रिया आरंभ की।
अपने सिद्ध स्थान पर हल्दी से एक छोटा सा यंत्र बनाया , उस यंत्र के ऊपर कपूर का चुरा चढ़ाया जिससे पुरा यंत्र ढक गया। यह हल्दी व कपूर‌ पूर्व अभिमंत्रित था। अब उस चावल व फुल को उसके मध्य स्थापित कर कुछ मंत्र पढ़़ना आरंभ किया। मंत्र पढ़ते कुछ समय बीता होगा, ऐसा लगा जैसे पुष्प में स्पंदन हुआ हल्का। फिर लगा चावल में हल्का स्पंदन हुआ।
सुखा हुआ पुष्प जो काला पड़ चुका था वो एकाएक गहरे रंग का होने लगा और उसी समय सोखा ने एक कपूर को दीपक से जला कर कुछ मंत्र बुदबुदाहट के साथ उस यंत्र पर डाल दिया। कपूर चुर्ण से बना वह यंत्र पुरा जल उठा , उसके मध्य रखा हुआ चावल व पुष्प भी चटचटाकर जलने लगा। एक गहरा दुर्गंध वातावरण में कुछ समय के लिए फैल गया। पुनः सोखा ने धुनि किया व यंत्र का राख काले कपड़े में बांधकर एक मटके में डाला व उसे निर्जन स्थान में गाड़ने हेतु अपने सहयोगी को दे दिया‌।
बालक के पिता ने कुछ दक्षिणा चढ़ाई व धन्यवाद करते हुये वहां से पुनः अस्पताल गया। आश्चर्यजनक रुप से बालक में सुधार आया व शाम तक युवा बालक घर वापस आ गया।
उसी रात जब सभी सोये हुये थे। उस घर के भीतर किसी के कुदने की आवाज आई, आवाज इतनी तेज थी की बाहर तक गुंज पहुंची। जो भी सुना किसी अनहोनी की आशंका से घर के भीतर उस ओर भागा जहां से आवाज आया था। गांव का घर जिसमें बीच में आंगन व चारों और कक्ष। ब्रह्मस्थान पुरा खुला हुआ व तुलसी पीठ स्थापित।
उसी के पास सीढियां थी जहां से कोई कुदा था। सन्नाटे में आवाज अधिक गुंजायमान हो गयी थी‌। वहां वही बालक सर झुकाये बैठकर धीरे धीरे हिल रहा था। मुख नीचे की ओर।
एक एक कर उसे पुकारते हुये लोग उसकी ओर बढ़े, इसके पहले की कोई उसे छुता उस बालक ने अपने सामने आ रहे अपने चाचा के ऊपर छलांग लगा दी व उन्हें संभलने का मौका दिये बिना पटक कर पीटना आरंभ कर दिया। इतना तो सभी समझ रहें थे की संस्कार से युक्त यह सीधा बालक अपने आप तो यह कर नहीं सकता। घर के पुरुषों ने बलात उसे पकड़ कर हटाया व कस कर मजबुत पकड़ में जकड़ा। उसके सुखे हुये चेहरे पर आयी क्रोध व लाल आंखे देखकर कोई भी एक बार सहम जाये। वह दांत पीस रहा था। मुख से थूक गिर रहा था व वह पकड़ से छुटने का पूरा प्रयत्न कर रहा था।
उसकी माता जी को क्या सुझा उन्होंने अपने पुजन स्थान पर रखे गये तुलसी पत्र युक्त लोटे का जल पुरा उस पर उझल दिया। आवेश कमजोर हुआ व बालक का शरीर स्थिल पड़ गया।
रात भर पुनः कोई प्रतिक्रिया नहीं हुई।

प्रातः सब कुछ ठीक था। किंतु उसके पिताजी और चाचाजी पास गांव के उस जानकार के पास पहुंच कर सारा विषय बताया‌। सोखा ने कहा की आज रात मैं आपके घर आकर इस विषय को पुरा देखता हुं। उन्होंने सामग्रियों का एक सुची बनाकर दे दिया व कहा की व्यवस्था रखें घर पर।
ये लोग बाजार से सभी सामग्री लेकर घर पहुंचे व रात्रि की प्रतीक्षा में लग गये। दो दिन से पुरा घर अव्यवस्थित हो गया था इस कारण कुछ लोग अपने कार्य पर लग गयें। वह बालक दिन भर सोता रहा। दोपहर पश्चात लगभग संध्या के समय उठा व नहा धोकर भोजन आदि किया। उस समय उसका व्यवहार काफी सामान्य दिखा। रात को सोखा घर आयें व अपना व्यवस्था जमाना आरंभ कर दियें।
एक संक्षिप्त पुजन धार देकर वह अपने आसन पर बैठ गयें तथा पीड़ित को सामने आसन पर बैठाया।

अब अपनी क्रिया आरंभ की उन्होंने। अक्षत पढ़कर उस बालक पर फेंकना आरंभ किया तथा आवेशित शक्ति ओक निमंत्रण देना भी संग संग आरंभ कर दिया। बालक बिना किसी प्रतिक्रिया के बैठा रहा। उस पर कोई आवेश नहीं आया। वह सामान्य रहा।
परंतु यह वहां उपस्थित सभी का सोचना था। वास्तव में वह बालक पूर्ण आवेशित था लेकिन साथ ही पूर्ण नियंत्रित। जब सोखा अंतिम प्रयत्न कर लिया तब बालक ने अट्टहास करते हुये कहा – अलख निरंजन। जय गिरनारी। 💀💀💀
सोखा जी के गोटे ऊपर हो गये। क्योंकी भले सबकी अपनी पद्धति होती है सोखईती में आवाहनी देने की लेकिन शरीर खाली है या नहीं यह बिना जाने अक्षत एक सीमा तक फेंका जाता है। इन्होंने तो अंतिम आवाहनी के अक्षत तक फेंक दी थी।

हाथ जोड़ क्षमा मांगते हुये सोखा जी ने पुछा की – महाराज हमें क्षमा कर दें, हम नहीं पता था की आप हैं शरीर पर। कृपया कर अपना परिचय बताईये तथा इस बालक को आवेशित करने का कारण भी।‌

बिना देर किये गंभीर आवाज गुंज उठा – परिचय बस इतना की हम दत्ता के सेवक हैं।

सोखा – दत्ता कौन ? क्या यह उस दुष्ट तांत्रिक का नाम है जो आपको इस बालक पर भेजा है ?

आवेशित शक्ति – हंसते हुये – तुम रहने दो मत जानो हम कौन हैं और कौन भेजा है। इतना समय नहीं है‌। इस बालक को बह्मकुंड में स्नान करवा दो यह पुर्ण स्वस्थ हो जायेगा। आगे कोई दिक्कत नहीं होगा‌।
यह बोलकर बालक निढ़ाल हो गया।

अगले दिन परिवार के लोगों के साथ बालक कुंड पहुंचा व स्नान किया।
स्नान उपरांत जब वह बाहर निकला तब हुआ आरंभ उस तंत्र कथा की जो अभी छुपा था सभी लोगों से….

अगला भाग यथाशीघ्र……

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