भस्मांचल पर्वत के सप्तकर्णी गुफा से निकल कर उष्ण जल का स्रोत भगवान ब्रह्मा जी के द्वारा निर्मित कुंड में आ गिरता है जिसमें अनेक दिव्य व औषधीय गुणों की उपस्थिति रहती है। यही है ब्रह्मा कुंड। यहां की महिमा पुराणों में बताई गयी है। अनेक सिद्धों का यह स्थान है व आज भी इसकी तांत्रिक महत्ता उपस्थित है। 22 कुंड व 52 धाराओं में गुप्त योगिनियों की व उग्र भैरवों की उपस्थिति के कारण आज भी यहां जानकार तांत्रिक अपनी साधना गुप्त मार्ग से करतें हैं।
पितृ दोष आदि के कारण जीवन में श्राप दोष उपस्थित हो गया हो तो यहां स्नान कर त्रिपिंडी श्राद्ध करने से शीघ्र इससे निवृति होती है।
इसी स्थान पर बालक को लाया गया। कुंड में प्रवेश कर देर तक स्नान करने के पश्चात वह कुंड में ही जप आदि किया। कुंड मध्य ही वह पूर्ण आवेशित दिखा। सोखा साथ गये थे। वह भी अपने भेष भुषा में कुंड में विधि अनुसार प्रवेश कियें। उनके साथ दो और सहयोगी जानकार भी थे। वे तीनों बालक को घेरकर खड़े हो गयें। कुछ समय पश्चात आवेशित बालक जयकारे लगाना आरंभ किया। तब सोखा हाथ जोड़ कर पुनः पुछे की आप कौन हैं। कृपया अपना परिचय दीजिए तथा बालक के किस अपराध पर आप इस पर आवेशित हैं यह बताईये ताकी हम सब उसके निमित्त अपराध क्षमापन कर आपको प्रसन्न कर सकें। बालक का शीश तेजी से जल के मध्य कांप रहा था। वहां उपस्थित सरकारी रक्षक ने बेहुदगी से आवाज लगाकर सभी को बाहर निकलने कहा। और उल्टा सीधा बोलने लगा। बालक बस एक हुंकार के साथ उस ओर देखा जहां से अनर्गल विषय बोला जा रहा था। कुछ ही क्षणों में ना वह रक्षक चुप हो गया वरन वह वहीं बैठ गया, अब कोई उस पर ध्यान ना देकर, बालक के समक्ष हाथ जोड़कर पुनः पुछा महाराज कृपा करें हम सब आपके समक्ष कुछ भी नहीं। हम पर दया करें व बालक को मुक्त करें, इस हेतु आप अपना परिचय दें।
बालक का शरीर काफी तेज कांपने लगा , जल के मध्य वह हुंकारे व जयकारते हुये भगवती मणिकर्णिका व भगवान दत्तात्रेय के जयकारे लगाने लगा। व काफी रौबदार आवाज में कहा – काशी महाश्मशान का सिद्ध हूं। मैं इस बालक के साथ आया हूं। इसके साथ रहता हूं। मैं कोई भूत प्रेत नहीं जो तुम मुझे बांध लोगे। हा हा हा हा हा। महाश्मशान के राख में भगवती मणिकर्णिका के सेवा में भगवान दत्तात्रेय के कमंडल के जल से अपने शरीर पर भस्म धारण करने वाला मैं अग…. सिद्ध हुं।
इसके चाचा के कहने पर बांस के बीच मसान की चौकी बैठाई गयी थी। इसको मारने के लिए, अपने ही भाई के वंश को समाप्त करने के लिए, इसके चाचा ने इसी से वह थान कटवाया और तभी मसान की पूरी चौकी इस पर लग गयी। बालक को मारने आने वाले भूल गयें की इसके साथ कौन है। मैं याद दिलाता हूं की मैं कौन हूं। जोर का अट्टहास करते हुये लगभग जल में इतनी तेज बालक उछला की कोई उसे संभाल ही ना पायें। हाथ जोड़कर क्षमा मांगते हुये उसके घर के लोग व सभी सोखा लोग कहें की आप शांत हो जाईये तब तो हम लोग आपके निमित्त कुछ करेंगे।
बालक का पिता सत्य को स्वीकार करना नहीं चाहते थे। उन्हें शंका थी की कोई भाईयों में फुट डालने के लिए किसी भूत को इस पर खेला दिया है। वह सोखा से इसे परखने के लिए कहें।
सोखा अब अपनी सोखाईती आरंभ किया। पहले उसे तीनों लोग पकड़ लियें और अपने गुरु परंपरा के शाबर से बंधन मंत्र चलायें ताकी शरीर के साथ यह शक्ति भी बंध जाये। बालक जोर से हंसा और तीनों के गुरु का नाम लेकर कहा की इनकी नहीं चलेगी मेरे सामने। मैं धर्म पर हुं। सोखाओं की थोड़ी तो फटी की भाई यह जो भी है तगड़ा चीज है। गुरु का नाम पकड़ लिया। लेकिन वे लोग रुके नहीं और अपना काम करतें रहें। लगभग दस मिनट तक जोर जबरदस्ती करते हुये बीत गया व बालक का शरीर भी थक गया। वह शांत स्थिल हो गया व शरीर ढीला छोड़ दिया। सोखा सोचें की आया बंधन में। इनका आत्मविश्वास बढ़ा व वह तीनों इसे कुंड के बाहर खींचने लगें। लगभग दो कदम खींचे होंगे। बालक अट्टहास करते हुये मुख्य सोखा को पकड़ कर पुरा हवा में उठाकर जल में ही पटक दिया। दुसरे को इतना तगड़ा मुक्का पड़ा की वह लड़खड़ा कर गिर गया। तीसरा यह सब देखकर ही दुर भाग खड़ा हुआ। वहां पहले से जल में एक ओर स्नान कर रहें एक नाथपंथी साधक पास आ गयें व उनके द्वारा हस्तक्षेप व कुछ विशेष जल क्रिया करने पर बालक शांत हो गया। फिर उनके सहयोग से बालक को कुंड के बाहर लाया गया। कुंड के बाहर आने पर एक ओर बैठकर बालक शांत अवस्था में चुप चाप पड़ा रहा। अब सभी लोग आपस में मंत्रणा करने लगें की क्या सच है और क्या करना चाहिए।
नाथपंथ के साधक ने अपने अनुभव से इस विषय के लिए अग्यारी पर सिद्ध आहुति चेता कर वहीं सब विषय शांति से जाना जाये। अगर ये सिद्ध होंगे तो उसकी अवमानना नहीं करेंगे।
अब विषय यह था की इनकी पंथ परंपरा का ज्ञान था नहीं। पुरा विषय बिना जाने किस पीठ की अग्नि आवहन हो। तब इनके कहे गये वचन अनुसार ही काशी क्षेत्र अनुसार विषय लेकर चला गया। एक सुरम्य स्थान पर कुंड के थोड़ी दुर गौ उपले पर विधिवत मध्याह्न अग्नि आवाहनी विधि से अग्यारी की गयी। व वहां बालक के निमित्त आसन रखा गया। वह आकर बैठा। नाथपंथ साधक ने संक्षिप्त विधि से अपने परंपरागत तरीके से अग्नि पुजन व गुरु परंपरा की अगियारी की। तत्पश्चात आवेशित बालक से परिचय पुछा। अलख आदेश जब गुरुओं को दिया गया तब आवेशित बालक भी अपने गुरु जी के नाम से अलख आदेश किया।
नाथपंथ साधक ने अब क्रमगत प्रश्न पुछना आरंभ किया।
(व्यक्तिगत प्रश्नों को सार्वजनिक नहीं किया जा रहा क्योंकि अब वह इनके यहां पुजित हैं व इन प्रश्नों को परपंरा अनुसार ही ससम्मान पुछा व बताया जाता है)
जब आप इसके ऊपर इतने कृपालु थे और इसने कवच सिद्ध भी कर लिया था तब इसके चाचा के द्वारा करवाया गया तंत्र अभिचार का षडयंत्र इस पर कैसे सफल हुआ वो तो होना नहीं चाहिए था
-उत्तर- पिशाच मसान के चौकी लगाने वाला , बैठाने वाला स्वयं नाथपंथ साधक है , उसके आन आदेश में हम बंध गये। सुरक्षा में सक्षम ना हो सकें
आप इस बालक पर क्यों आयें ?
जो उत्तर पहले दिया था वही बालक ने पुनः कहा
आप साथ रहते हैं ? पर क्यों और कैसे साथ आ गये?
उत्तर – काशी क्षेत्र में इसके दादा लंबे समय तक रहें थे। वहीं उन्होंने भगवान दत्तात्रेय की अनेकों साधनाएं की थी। उनके सिद्ध समुह में मेरा भी पुजन होता आया था। भगवान दत्तात्रेय के वज्र कवच का त्रिकाल संध्या पाठ करते थे। उनके नियम निष्ठा से प्रसन्न होकर सिद्ध गुरु आदेश अनुसार हम उनकी रक्षा में तत्पर थे।
दादा पर आपकी कृपा थी , आप उनके साथ थे लेकिन यह तो उनका पौत्र है । इसके साथ कैसे आयें
उत्तर – इसके दादा ने बचपन से ही इसे वज्र कवच का पाठ सिखाया था व एक वर्ष दत्तात्रेय जयंती पर बालक अपने दादा साथ काशी मणिकर्णिका महाश्मशान पर विराजित महासिद्ध भगवान के दर्शन पुजन हेतु गया था। 15 वर्ष की अवस्था में यह बालक अपने दादा के आदेश अनुसार दत्तात्रेय पादुका पुजन पश्चात वही वज्र पंजर का अत्यंत समर्पण से अनुष्ठान किया था। दादा व पौत्र ने बहुत हृदय से वहां सेवा पुजा किया व दादा ने जब आशीर्वाद दिया तब उसी समय मैं अगले पीढ़ी का चुनाव कर लिया था।
जब जानकार अपने स्थान पर लाग काट दिया तब उस कर्पूर काली यंत्र के प्रभाव से मेरा भी बंधन खुल गया और हम पुर्ण रक्षण हेतु इस पर सवार हो गयें।
चाचा तो सब देख सुन ही रहे थे। रक्त संचार जम गया था। ऐसी उग्र शक्ति के समक्ष झुठ बोलने का सामर्थ्य था नहीं। बालक के पिताजी अपने प्रिय भाई के करनी से टुट चुके थे। वो क्षुब्ध हो हाथ जोड़े बस खड़े थे।
सब विधान हुआ। तब धार लेकर आवेशित सिद्ध शक्ति ने यह कहते हुए शरीर छोड़ा की बालक की एक पुकार पर मैं आकर इसकी रक्षा करुंगा। जब तक बालक धर्म पर चलेगा इसके दादा के पुण्य से इसके वंश तक का मैं रक्षा करुंगा। शीघ्र काशी आकर काशी दर्शन करो सभी।
जय गिरनारी जय दत्त
बोलते हुये शरीर स्थिल हो गया।
आप सोचते हो ना की हम इतना जप कियें कुछ नहीं हो रहा। देखो काल है काल चक्र सब कुछ देगा बस धैर्य रखकर अपने आराध्य के श्री चरणों में समर्पित होकर साधना करो।
आराध्य के सेवक गण आपके समर्पण व हृदय की शुद्धता से प्रसन्न होकर आपके अंग संग चलने लगते हैं व आपके पीढ़ियों तक रक्षण करते हैं। जब तक आप धर्म पथ पर रहेंगे तब तक आपके पूर्वजों का पुण्य आपकी रक्षा करेगा और जब अधर्म पर चलेंगे तो पूर्वजों के पाप भी साथ हो लेंगे। महागुरु भगवान दत्तात्रेय हम सभी पर कृपा करें