Grihasth Tantra

ब्रह्मपिशाच प्रपंच भाग-5

अगले दिन रामभुवन और रोहित गांव के बाहर डीह पर पहुंचे। डीह गांवों में पूजित लोकदेवता होते हैं जिनके आज्ञा के बिना कोई भी शक्ति गांव में प्रवेश नही कर सकती। मारण प्रयोग में अभिचारी सबसे अधिक इनको ही मनाता है ताकी रक्षक शक्तियों को डीह रोक कर रखें। जैसे प्रधानमंत्री जी को भी एक आ ए एस अधिकारी के समक्ष अपना नॉमिनेशन फाइल भरने हेतु उनके अॉफिस जाकर ससम्मान फाईल जमा करना होता है ठीक उसी प्रकार डीह बाबा, ग्रामदेवता, क्षेत्रपाल, ग्राम देवी इत्यादि पद पर प्रतिष्ठित शक्ति का अधिकार क्षेत्र होता है़। उनको मनाना पड़ता है तभी कोई तंत्र अभिचार चल पाता है।डीह पर पहुंच कर वहां रोहित और रामभुवन ने विशेष तंत्रोक्त पूजन संपन्न किया और फिर जिन शक्तियों का प्रयोग करना था उन सभी को डीह पर आमंत्रण दे दिया। आमंत्रित शक्तियों को भी तामसिक विधि से भोग पूजा देकर अभिचार प्रयोग हेतु अपनी आरंभिक प्रक्रिया पूर्ण कर ली।फिर मदिरा की धार से सभी को संपुटित कर चेता दिया, अब केवल प्रक्षेपण हेतु क्रियायें बची थी।वहां का कार्य संपन्न कर दोनों रात की तैयारी में लग गये। रात की क्रियायें हेतु जो जो भी आवश्यक वस्तुयें थी सभी का संचय शाम होने से पूर्व कर लिया गया। उधर संजय को खबर दे दिया गया की ब्रह्म पिशाच को बंधन मुक्त करने हेतु गांव के सीमा पर शक्ति आवाहित की जा चुकी है और आज रात मसानी क्रियायें आरंभ होगी।संजय ने अपने गुरु का स्मरण किया एवं शाम के समय गुरु मंत्र से धुना चैतन्य किया। गुरु मानस पटल पर साक्षात हुये। वर्तमान परिस्थिति में आये हुये धर्म संकट पर अपने परम पूज्य गुरु से संजय ने मार्गदर्शन मांगा। गुरु जी ने कहा किसी के लिखित प्रारब्ध को कोई नही मिटा सकता। अगर शक्ति ने उनका सर्वनाश ऐसे ही रचित किया है तो फिर तुम कुछ नही कर सकते। तुम्हारा अब वहां कोई नियंत्रण और अधिकार उचित नही। और कुछ विशेष निर्देश देकर गुरु जी पटल से अंतर्ध्यान हो गये। संजय  ब्रह्म बंधित कलश को लेकर  अपने पूजित पीपल वृक्ष के पास गया और वहां पर उस पिशाच को अपने तंत्र बंधन से मुक्त किया। जनेऊ, लड्डु तथा पवित्र गंगा का धार दे उसे मुक्त किया। पाठकों को बताते चलें की शक्ति कोई भी हो चाहे वह देव हो या प्रेत पिशाच सभी का अपना सम्मान होता है। उन सभी में भी कामनाऐं होती हैं इसलिये ही वे इस योनी में गयी होती हैं। इसीकारण उनको भी सुख दुख तृप्ति क्षुधा इत्यादि का अनुभव होता रहता है। तंत्र में इन बातों का पालन एक जीवट साधक अवश्य करता है। जो साधक शिव शक्ति की प्राप्ति हेतु साधनाऐं करते हैं वे अपनी तंत्र विद्या के प्रयोग का उद्देश्य भी पीडित शक्ति के उद्धार और मुक्ति हेतु करने में विश्वास रखते हैं। संजय द्वारा लड्डु जनेऊ और गंगा धार से पिशाच को शांति प्राप्त हुयी तथा उसकी उग्रता कुछ कम हुयी। संजय ने अपने बामत शक्ति को आदेश दिया की इन्हें इनके स्थान तक छोड़ आओ। आज्ञा पाते ही बामत ब्रह्म को पल भर में खंडहर मस्जिद पहुंचा कर वापस आ गयी। (बामत शक्ति की पूरी रोचक जानकारी आपको हमारे चैनल गृहस्थ तंत्र पर मिल जायेगी)संजय ने भोग दे बामत को विलीन किया। और अपने क्षेत्र पर अष्टभैरव बंधन लगाने हेतु अनुष्ठान आरंभ किया। गुरुजी से प्राप्त निर्देश अनुसार वह आगे की प्रक्रिया में लग गया। शक्ति के साथ दायित्व भी आता है जिसको एक सच्चे साधक को निभाना पड़ता है। दायित्व निर्वहन के कारण साधक बंधन में पड़ जाता है और उसकी जिम्मेदारी बढ़ जाती है इसी कारण अव्यवसायी साधक कम से कम तंत्र प्रयोग करते हैं और वह एकांत ही पसंद करते हैं।मर्कट भैरव के पुरे क्षेत्र को रोहित और अनिल ने जैसे उखाडा़ था उससे वह शक्ति बहुत क्रोधित थी। होना यह चाहिये था की जिस अंश को रक्षण हेतु वहां स्थापित किया गया था उसको भी वह ससम्मान और विधि से विसर्जित करते। जो रक्त पाषाण चबुतरे के पास स्थापित और लंबे समय से पूजित थी उसको इन लोगों ने केवल खसका कर थोडा बगल में रख दिया था और इतने अधिक विसर्जन क्रिया को करने के बाद अब इन लंपटों को ध्यान गया नही की मर्कट भैरव के थान का वह रक्त पाषाण ही ऊर्जा का मुख्य द्वार था। उसके बगल में ही रामभुवन पिशाच पिंड रखवा दिया था। लेकिन विधाता ने कुछ और भी रच रखा था जिसके कारण रामभुवन और रोहित ने पाषाण अंश को हटाया ही नही और उसे सामान्य पत्थर की भांति समझने की भुल कर बैठे।इधर बलराम अपने कुछ पुण्यों के कारण एक शुभ काम कर गये की वह पिशाच पिंड के समक्ष करंज दीपक जलाने के साथ साथ सरसों तेल का दीपक उस भैरव पाषाण के समक्ष भी जला देते क्योंकी उनको तो वही रक्षा कारक देवता बताकर पूजवाया गया था तो उन्होंने यह सोचा की यह पत्थर तो इतने सालों से पूजित है इसके समक्ष भी दीपक जलते रहे तो भैरव प्रसन्न शीघ्र हों। चुंकी वह अंश ना गंगा विसर्जित हुआ ना ही उसका संहार मुद्रा से स्थान परिवर्त्तन हुआ,इस कारण उसमें मर्कट भैरव का अंश विद्यमान रहा और फिर पूजित भी स्वतः हो गया। अस्तु विधाता का खेल।🙏❤🙏अष्टभैरव बंधन लगाने के पश्चात अब संजय को करना था अगले चरण की शुरुआत जिसके लिये उसने अपने उस मित्र को बुलाया जिसके माध्यम से बलराम और देवराज उस तक पहुंचे थे। उसे सारी बातें समझाकर संजय ने भेज दिया बलराम के घर और स्वयं अपनी तंत्र सामग्री की झोली ले चल पडा़ उस गांव के ग्राम देवता के स्थान पर। वहां जाकर मीठा भोग और धार दे। 5 अगरबत्ती जलाकर डीह पूजन किया तथा अपने शक्तियों का आवाह्न किया। रोहित और रामभुवन की शक्तियां भी उसी डीह में थी लेकिन वह खबर नही दे सकती थीं क्योंकी उन दोनों ने स्वयं उनको वचन से और मंत्र से एक निश्चित काल तक के लिये डीह में ही रहने हेतु आबद्ध कर रखा था। वैसे डीह पूजन करने के बाद बाहरी शक्ति के आने की जानकारी गांव के अंदर बैठे सेवडे़ सयाने को डीह द्वारा दे दी जाती है लेकिन रोहित और रामभुवन अपनी सफलताओं से अतिविश्वासी हो चले थे और उन्होंने डीह स्थान से संदेश हेतु निवेदन ही नही किया। संजय ने वहां एक स्थान को एक रंगी गाय के पंचगव्य से शुद्ध किया और कुशा आसन पर बैठ पंचरंग से एक विशेष मंडल बनाना आरंभ किया। मंडल बनाकर उसके विभिन्न भागों में एक रंगी गाय के गोबर रखकर उसपर कुशकंडिका खडा़ किया। यह मर्कट भैरव का सुक्ष्म मंडल था। बिंदु मध्य स्थान पर कमल पुष्प आसन हेतु रख मंत्रों का जप आरंभ कर दिया और अपने मित्र की प्रतिक्षा में लग गया।उधर संजय का मित्र जो देवराज का भी मित्र था(दुसरा भाग में पढें) बलराम के घर पहुंचा। चाय नाश्ता के लिये मना कर दिया पुछने पर। और फिर वर्तमान स्थिति की जानकारी लेने हेतु सब बात पुछीं। देवराज ने बताया की क्या क्या हुआ और संजय ने इतने सारी झुठी बातें बतायी थीं। शालिनी भी समक्ष आयी जो बिल्कुल सामान्य थी अब देखने में। लगभग एकाध घंटा बात करके वह वापस जाने हेतु निकला। घर के दरवाजे तक देवराज आया विदा करने हेतु। शाम को तंत्र क्रियायें होनी थी ऐसा निर्देश रोहित ने दिया था तो वह दरवाजा से बाहर गया नही। विदा पाकर वापस आते समय संजय के मित्र ने शमी वृक्ष के पास से झटके में अभिमंत्रित लाल वस्त्र भैरव पाषाण पर फेंक क्षण में उठा कर तेजी से बाहर निकल गया और गाडी़ चालु कर पल भर में हवा हो लिया। उधर रोहित और रामभुवन अपनी तैयारी पुरी कर शाम 8 बजे पहुंचे बलराम के घर। अब करना भी क्या था इन्हें घर के लोग तो इन दोनों के ही बातों में थे अगर ये लोग जहर भी खिला देते प्रसाद बोलकर तो सभी खाकर मर ही जाते। लेकिन अनिल इनको केवल शरीर से मृत्यु देना नही चाहता था। उसी हेतु रोहित और रामभुवन को तैयार किया था।दोनों आसन लगा बैठ गयें और शालिनी को बुला लिया। शालिनी पर अभिमंत्रित राई फेंकते ही वह झुमने लगी। रोहित ने पुछा परिचय दो। उसने कहा घर का देव।अब घर का रक्षण तो होगा ना। शालिनी ने कहा बिल्कुल।और फिर पुजा भोग देकर बाहर चबुतरे पर पुनः पान बिडा़ प्रसाद बोलकर सभी को खिला दिया गया। वास्तव में मसानी क्रिया कर के सभी को अपने मारण तंत्र के हद में ले रहे थे दोनों। पुनः धार दे कर शालिनी को शांत कर दिया। रामभुवन ने कहा की आपके घर में शालिनी के शरीर पर देवता आयेंगे और यही अब सब कुछ बतायेंगे। शत्रु और बाहरी अभिचार से रक्षण करेंगे। इनका पूजा भोग अब देते रहिये। तिसरा पूजा हम लोग 7वां दिन करवा देंगे फिर आप लोग सदैव के लिये निश्चिंत हो जायेंगे।इतना कह कर सब समान समेट रात्रि भोजन हेतु सभी चलें। बलराम के घर में अब सब कोई प्रसन्न थे तीन से चार दिन में सब कुछ सामान्य हो चला था। रोहित और अनिल पर सभी का विश्वास बढ़ चला था। रोहित और रामभुवन को कब केवल तीसरी चरण की क्रिया करनी थी।इधर अपने गुरु से प्राप्त निर्देश के अनुसार संजय ने डीह स्थान पर मंडल बनाकर भैरव पाषाण को प्रतिष्ठित किया। पुनः अपने गुरु विद्या का प्रयोग कर मर्कट भैरव का आवाहन किया। चुंकी वही स्थान था जहां स्थान तोड़ने के बाद रोहित ने भैरव शक्ति को विसर्जन हेतु स्थान दिया था तो संबंधित ऊर्जा विद्यमान थी। पाषाण पुनः पूर्ण प्रतिष्ठित हो चली। संबंधित मंत्रों का मुण्डमाल से संजय ने जप आरंभ किया और निश्चित जप करके सुरा संपुट कर मुंडमाल को उसमें डुबाकर पाषाण को अभिषिक्त कर डाला। अब भोग पुजन दे विभिन्न मुद्रायें के द्वारा ऊर्जा संतुलित कर पुनः उन्हें शांत किया। किसी भी स्थापित तंत्र ऊर्जा को उखाड़ने में जितनी ऊर्जा और युक्ति का क्षय होता है उससे कितने ही गुना अधिक सावधानी उसे पुनः संतुलित करने में लगता है। एक गुरु कृपा प्राप्त साधक ही ऐसे क्रियाओं को करने में सक्षम हो पाते हैं। चुंकी उनकी आकांशा भी शांति कर्म होती है अत एव शक्तियां भी साथ देती हैं। सब पुजन पुर्ण कर एक मिट्टी के सुंदर पात्र में विभिन्न सुगंधित पुष्पों के बीच भैरव पाषाण को रख कर संजय अपने मित्र के साथ अपने तंत्र पीठ की ओर प्रस्थान कर गये। जाने से पहले धार भोग देकर डीह पर उपस्थित सभी शक्तियों को किसी से भी इस घटना का भेद ना देने हेतु वचन वद्ध कर दिये।उधर खंडहर में पहुंचा ब्रह्म की जानकारी रोहित और रामभुवन को लग गयी थी। दोनों की प्रसन्न और बढ़ गयी। सोचे की संजय खुद ही रास्ते से हट गया और इस मामले से दुरी बना ली। यह बात इनके क्रियाओं के हेतु लगने वाले खर्चे और समय दोनों को बचाने वाली थी। केवल मंत्रों द्वारा पुनः खींच कर रोहित ने पिशाच को पीपल पर बैठा दिया। जहां उसकी जोडा़ शक्ति भी मौजूद थी। अब सारा मामला बस एक झटके का था। मसान की शक्ति द्वारा इस परिवार को डुबाने का समय आ गया। अंतिम प्रक्रिया बस बची हुयी थी जिसकी प्रतिक्षा थी अनिल के हितकारों को।इधर संजय तंत्र पीठ पर भैरव पाषाण को स्थापित कर पहली रात्रि चारों प्रहर की तंत्रोक्त पुजन कर उनको प्रसन्न कर लिया और बलराम की परिवार के रक्षण हेतु वचन लेने का प्रयास किया। गुरु कृपा और संजय के लोक कल्याण समर्पण को देखकर मर्कट भैरव ने संजय को शमशान भूमि पर मर्कटेश्वर मंडल पर पाषाण स्थापित कर पुनः सर्व तंत्रोक्त विधि से पूजन कर चित्ताग्नि में तंत्रोक्त हवन का निर्देनश दिया और आगे की क्रिया हेतु गुरु आदेश लेने को कहा। यहां मर्कट भैरव केवल बिंब रूप में पटल पर निर्देश दे रहे थे। उधर जब सुबह देवराज दीपक जलाने गया तो पाषाण को ना पाकर चिंतित हो उठा तुरंत पिता को सुचित किया। तड़के ही दोनों अनिल के घर पहुंचे और वहां बताया कि पुराना पत्थर नही है। रोहित ने ज्यादा ध्यान नही दिया लेकिन अनिल ने सारी बातें पुछीं तो देवराज ने बताया की अभी भी कर रहे थे उसकी भी सेवा। रामभुवन ने भी इस मामले में कोई विशेष दिलचस्पी ना दिखायी। उन दोनों ने समझा दिया की उसके भुलने से कोई दिक्कत नही नया पिंड तो है सही सलामत अगर दिक्कत होता तो शालिनी पर देवता खुद आ गये होते। इन बातों से संतुष्ट हो बाप बेटे लौट आये।अनिल ने इनके जाने के बाद रोहित से सवाल जबाब किया और उसका अनुभवी मस्तिष्क कुछ गड़बड़ की आशंका से भर उठा। उसने दोनों को कहा की सही से पुछा लो नही तो हमारी बनती बात कभी भी बिगड़ सकती है। रामभुवन ने अपने मसान को सारी बातें पता करने भेजा। कुछ देर बाद आधी अधूरी जानकारी ले मसान पहुंचा। रामभुवन ने बताया की ऐसा ऐसा बता रहा है। सबके दिमाग में तुरंत खटका की आखिर घर से पत्थर देवराज का दोस्त कपडा़ डाल कर क्यों ले गया। अब तीनों सकते में थे की क्या चल रहा है। और यह दोस्त क्यों करेगा ऐसा। संजय के वचन में डीह की शक्तियां थी लेकिन घर पर उपस्थित प्रेत वहां की जानकारी पुछने पर तो बता ही सकते थे तो आधी अधुरी जानकारी मसान ने वहीं से लेकर दे दी।

कहते हैं ना वही होगा जो विधाता ने रच रखा है फिर भी मनुष्य तब तक प्रयास नही छोड़ता जब तक उसके पास अवसर और विकल्प समाप्त नही हो जाते।

संजय भी वही कर रहे थे। जितना ज्ञान और विद्या उन्हें प्राप्त हुई थी उसके अनुसार वह पूर्ण प्रयत्न कर रहे थे की वह इस परिवार को बचा सकें।
अपने मित्र के साथ अगले दिन शमशान में मर्कटेश्वर पूजा की विधि हेतु सामग्री लेने चले और शाम तक तैयारी पूर्ण कर ली। रात के 10 बजे से विधान आरंभ करना था।

उधर रामभुवन और रोहित आज की रात अपनी सारी विद्या का दांव लगाकर पूर्ण मारण हेतु तैयारी कर रहे थे। इनकी भी तैयारी जोर शोर से चल रही थी। देवराज और प्रियांशु इनको सहयोग कर रहे थे सामग्री एकत्रित करने में। जिस काले मुर्गे को लेकर प्रियांशु आया था वही मुर्गा इसकी प्राण लेगा ऐसा सोचा नही होगा प्रियांशु ने कभी। बलराम का परिवार तो इस भ्रम में था की अनिल का परिवार इनका ही सहयोग कर रहा है आज भी ताकी यह समस्या अब जड़ से खत्म हो जाये।

शाम को 7 बजे डीह पर जाकर रोहित ने पूजा देकर आज रात हेतु शक्तियों का आवाह्न कर लिया। साथ ही डीह बंधन भी कर दिया क्योंकी अब जो होना था इस डीह क्षेत्र के अंदर ही होना था।
मामला कैसे बिगडा़ना था इसकी पुरी कुटिलता से तैयारी कर रखे थे ये लोग।
रात नौ बजे तक आरंभिक स्तर की तैयारी पुरी हुई और फिर रामभुवन ने तीसरे दिन की अंतिम पिशाच पूजा बलराम के पुरे परिवार से करवा दिया।
यह बात आप सब तंत्र प्रेमी पाठकों को जानना आवश्यक है की अगर तंत्र अभिचार से किसी को मारा जाता है तो वह भी उसी योनी में चला जाता है यानि जो अभिचारिक शक्ति मारती है वही मार कर ले जाती है। अब यहां जिस पिशाच का पूजन इन सबके हाथ से करवाया जा रहा था एक तरह से वह छद्म बलि का हिस्सा था। यानि बलि स्वयं अपने गंतव्य देवता के पास प्रसन्नता से जाने हेतु निवेदन कर रहा है।
सबसे पूजन करवाकर रामभुवन ने एक घेरा में सबको बैठा दिया।
अब दोनों ने पूजन आरंभ किया। तंत्रोक्त विधान से घर के एक हिस्से को ही अस्थाई शमशान का रूप दे दिया था। तंत्रोक्त चिताग्नि समान हवन कुंड पर पहला बलि मसान हेतु कबुतर का दिया और समस्त दिशा बंधित कर दिया। फिर अगले ही कुछ पल बाद अगली बलि स्थापित पिशाच हेतु किया गया।
शराब की धार से मुंड को हंडियां में संपुट कर प्रत्यक्ष अपरोक्ष मारण प्रयोग रामभुवन ने सबसे पहले देवराज पर किया। यह भेद तो केवल रामभुवन और रोहित ही जान रहे थे कि क्रिया क्या हो रहा है वहां और क्षति किसको पहुंचेगी। बाकी लोग तो मौन बैठे तमाशा देख रहे थे।
रोहित मंत्र बुदबुदाना आरंभ किया और उधर देवराज झटके से खेलने लगा। अब सब चौंक गयें। रोहित ने कहा की हमलोगों के प्रयोग पर संजय पलटवार कर रहा है जिसका प्रभाव देवराज पर हुआ है और आगे किसी पर भी हो सकता है।
बलराम गुस्सा उठें। क्यों कर रहा है संजय ऐसा?
इसका जबाब किसी के पास नही।
रामभुवन ने सबको शांत बैठने का इशारा किया और मरघट भस्म से एक कांसा का थाली मार्जन करने लगा मंत्र पढ़ते हुये। कुछ देर करने के बाद थाली देवराज के शरीर से स्पर्श करवा कर वहीं रख दिया। थाली धीरे धीरे देवराज से दुर जाने लगी और एक फीट तक सरकने के बाद रूक गयी। उसके रूकते ही देवराज धीरे धीरे सामान्य हो गया।
वहां रामभुवन और रोहित ने ऐसा तगडा़ पाखंड का माहौल खडा़ किया की सब लोग भय से व्याकुल हो गये। उनमें से एक कोई प्रेत किसी पर चढा़ देता और दुसरा कुछ देर बाद उतार देता। साथ ही बोलते की संजय का वार हो रहा है। हम सब अपना काम नही कर पा रहे पुरा। संजय को रोकना होगा। पर वास्तव में इन दोनों को पता भी नही था की इनकी प्रपंच का अंत करने हेतु संजय अपनी तंत्र साधना का एक नया आयाम ही खोल चुका है।

अब लगभग 3 घंटे बाद सब कोई डर से थर थर कांप रहे थे । पता नही कब कौन खेलने लगे।
तब रामभुवन ने कहा की कोई मत डरो। अब मैं उस दुष्ट के हर वार का जबाब दुंगा। और यह कह कर एक हांडी पर शमशान का उड़द फेक कर उसे जगाने लगा। यह मिलान भेजने का एक प्रकार है। कुछ तंत्र प्रक्रिया करने के बाद, काला मुर्गा का बलि उस हांडी में दिया गया। अगले 5 मिनट तक कुछ विशेष आहुति हुई और उस मुर्गा का कलेजा उस हंडी में डाल एक मंत्र पढा़ भुवन ने, तभी अगले ही पल हांडी उठा और घर से बाहर निकल गायब हो गया। सबके सब भौंचक्के, क्योंकी मंत्र का ऐसा प्रभाव किसी ने नही देखा था। सबमें थोडी़ हिम्मत आयी की जिस साधक के पास ऐसी ऐसी शक्ति है वो जरुर हमारा रक्षण कर लेगा।
इधर तंत्रोक्त मसानिक प्रयोगों के कारण शालिनी थर थर कांप रही थी। सबके शरीर की ऊर्जा जबाब दे रही थी।
इन सबको चेतना शून्य की ओर बढ़ते देख दोनो नराधम खुश हो रहे थे।
तभी रामभुवन ने कहा की शालिनी के रक्त की कुछ बुंदे लेकर कुछ क्रियायें करनी होगी क्योंकी इसका शरीर ही सबका माध्यम बना है। कोई रोकने वाला था नही। एक अभिमंत्रित खप्पर पर शालिनी की मध्यमा उंगली से कुछ बुंद टपका कर उस खप्पर में अन्य द्रव्य भर दिया। और फिर कुछ तंत्र सामग्री तथा वह खप्पर ले
कर बाहर निकल गया कोई विधान करने। इधर रोहित इन सभी सदस्यों का घट अपने जोर से बांधे रहा। सभी कोई अर्ध मुर्छित जैसे थे। होश तो था पर सब कुछ समझ नही आ रहा था। बलराम प्रियांशु और देवराज तीनों पुरुष एक दम बेहाल थे। बाकी स्त्रियां थोडी़ बहुत होश में थी।
देवराज ने रोहित से कहा तुम कुछ करो। मुझे लग रहा है जैसे मेरे शरीर में कोई ताकत ही नही बची है। यही बात बलराम और प्रियांशु ने भी कहा। रोहित ने कहा की बस कुछ देर और रामभुवन के क्रिया करते ही आप सब ठीक हो जावोगे। सबको इस प्रकार कहने के बाद रोहित मशान की लकडी़ लेकर कुछ मंत्र बुदबुदाने लगा।
घनश्याम और रचना अपनी प्रेत शरीर से वहां उपस्थित थे। उनको बलि भोग देकर आवाह्न कर लिया गया था। छोटा मसान रामभुवन के साथ गया था।

उधर रामभुवन पहुंचा उस खंडहर मस्जिद पर जहां गडे़ थे हजारों सोने के सिक्के। उसे जानकारी थी इस बात की। चुंकी इस पिशाच मंडली को वह अपने नियंत्रण में ले चुका था इसलिये उन हजारों सिक्कों का लोभ उसे कितने ही रात सोने नही दिया। बलराम के परिवार की सामूहिक मारण के पहले ही यह निकाल लेना आवश्यक था। उस पुरे दबे खजाने का वास्तविक हकदार तो घनश्याम का वंशज रोहित था। लेकिन रामभुवन ने छल करके रोहित का रक्त खप्पर में ले और साथ में छोटा मसान को लेकर जो घनश्याम का ही अंश था पहुंच गया वहां।
वहां जाकर पुरे खंडहर के हिस्से को नाथी मंत्रों से तगडा़ बांध दिया ताकी रोहित को जानकारी ना हो। फिर उस स्वर्ण खजाने के स्वामित्व अंश रखने वाले मसान को खप्पर तथा भोग इत्यादि दे छल से वचन ले लिया की वह समस्त सिक्के उसके हों। ऐसी पिशाच स्वर्ण को ग्रहण करते समय अगर वह खजाना कोई वैसा व्यक्ति ले रहा है जो अंश का नही तो रक्त खप्पर बदला जाता है ताकी भविष्य में कभी भी किसी कारण से पिशाच घात न करे। यहां यह गलती हो गया रामभुवन से।
होता यह है की या तो वंशज को धन प्राप्त होता और उन प्रेतों पिशाचों को सद्गति उसके बदले दिलाना होता। या फिर तंत्रोक्त विधान से बांध कर लिया जाता लेकिन उसमें भी कितने ही सारे विधान होते हैं।
जल्दबाजी में जैसे तैसे विधान कर खजाना उठाना शुरु कर दिया रामभुवन। चुंकी इसकी सिद्ध शक्तियों का पहरा था इसलिये उस समय किसी अनिष्ट की आशंका नही थी। उसे भय था की रोहित को बस पता ना चले।
शालिनी के रक्त खप्पर का प्रयोग में देर हो रहा था। डीह पर रोकी गयी शक्तियों का प्रक्षेपण आधा अधुरा पडा़ हुआ था। जितना ज्यादा सिक्के निकालता भुवन, उससे ज्यादा वहां गडा़ हुआ दिखने लगता। वह अधिक से अधिक निकाल लेना चाहता था।

इधर संजय शमशान पहुंच चुका था और उसके मित्र द्वारा अथक प्रयास से एक शिशु मर्कट का मृत शरीर प्राप्त हो गया था। यह केवल देवकृपा से संभव था इसमें कोई संशय नही। चित्ता अग्नि प्रज्जवलित हुई और फिर एक पहर बीतने के बाद संजय ने मर्कटेश्वर पुजा आरंभ की।
चित्ता का दाह संस्कार संजय के मित्र ने किया था इस कारण वह अब एक दिन के मरण शौच के सूतक में थे। उनको संजय ने शमशान के बाहर एक हनुमान जी के मंदिर के पास राम नाम जप करने हेतु बैठा दिया था।

तंत्रोक्त विधान में सर्वप्रथम लाकिनी पूजन द्वारा पुरे शमशान को यथा उपलब्ध भोग दिया गया। तत्पश्चात कपाल पूजन आरंभ हुई। विशेष द्रव्यों की आहुति देने से चित्ताग्नि की लपटें काफी ऊंची होती जा रही थी। समस्त शमशान क्षेत्र में भयावहता फैल गयी थी। शमशान के श्वान भी किनारे हो कर रो रहे थे।
अब संजय ने शमशान जागरण हेतु पहले बहुत ही तगडा़ बंधन आसन के पास एवं चित्ता के चारों ओर लगाया । और अब लग गया शमशान जागरण की प्रक्रिया में।

उधर रामभुवन छल से यथाशक्ति स्वर्ण लुटकर एक आक वृक्ष के नीचे ले गया और वहां गाड़ कर आक वीर को रक्षण हेतु तत्काल वचन से स्थापित कर दिया।
अब वह मारण के अगली प्रक्रिया हेतु डीह की ओर चला।

इधर रोहित के सेवित मसान रामभुवन की जानकारी नही दे पा रहे थे। इससे रोहित चिंतित हो गया की कहीं कोई घात तो नही हो गया भुवन के साथ। वह देवराज को कुछ देर के लिये बंधन मुक्त किया और कहा की तुम सबका ख्याल रखो। लगता है रामभुवन किसी संकट में फंस गया है। संजय का वार शायद उसको कहीं घात कर गया है। देवराज चिंतित हो उठा और कहा की आप जाईये मैं सबको ढांढस बंधा कर साथ खडा़ हूं, कहीं हम सब हार न जाये। ऐसा खेल, ऐसा प्रपंच जिसमें अपने भक्षक को ही यह परिवार अपना रक्षक मान रहा था और अपने रक्षक को भक्षक।

रोहित डीह की ओर गया उससे पहले रामभुवन वहां पहुंच कर मसान पूजा शुरु कर दिया था। शराब की धार देकर पहला मारण हेतु प्रक्षेपण किया शालिनी के नाम। मसान घात बन कर चला और कुछ क्षण में पहुंच गया शालिनी के पास। एकदम से उछल कर शालिनी गिरी और तड़पने लगी। उसकी यह स्थिति देख सभी चिखने चिल्लाने लगे। देवराज बलराम किसी को कुछ समझ नही आ रहा था।
तब तक रोहित डीह तक पहुंच गया। भुवन से कहा काम में देर होता देख मैं यहां आ गया। भुवन ने कहा एक घात तो चल चुका है अब आ गये हो तो चलो दुसरा भी चला दिया जाये। और फिर अगला प्रक्षेपण कामाख्या के सिद्ध पिशाच का बलराम के लिये, कुछ क्षण बाद उधर बलराम भी धाराशायी हो दर्द से तड़प रहा था।

इस ओर संजय की अंतिम आहुति चित्ताग्नि में देते ही एक जोरदार विस्फोट हुयी और शिशू मर्कट का दहकता हुआ कपाल का अंश संजय के दंड पर पड़ कर चिपक गया। धार की प्रक्रिया पूरी कर संजय ने पास में बनाया हुआ मंडल पर मर्कटेश्वर भैरव के प्रसन्नता हेतु तत्काल बलि निवेदित किया और अगले ही क्षण चित्ताग्नि से हुं हुं करती ध्वनि चिंगारी के समान तेज अग्नि निकल कर चल पडी़ बलराम के घर की ओर। इधर तंत्रोक्त विधान से संजय ने पंच मर्कट बाणों को संधान कर रखा था और अपने इष्ट शक्ति की आदेश की प्रतिक्षा में था।
बलराम के घर पर मर्कट ऊर्जा के पहुंचते ही हाहाकार मच गया। घर की भीतर के शक्ति का संपर्क रोहित से टुट गया। डीह पर कोई जबाब ना पाता देख दोनों तेजी से घर की ओर दौडे़। आधे युद्ध को जीत चुके ये दोनों कोई भी संभावित खतरे को अपने ऊपर हावी नही होने देना चाहते थे।
इधर इशारा पाते ही संजय में 11 खप्पर उलट दिये। यह अभिचार पलटने हेतु विशेष तंत्रोक्त विधान था। खप्पर उलटते ही बलराम और शालिनी का शरीर एकदम से झटका दे शांत हो गया। लेकिन वह अभिचारिक शक्तियां वहीं रह गयीं क्योंकी भैरव ने सबकुछ रोक रखा था।

इधर रामभुवन और रोहित ने वापस आने पर पाया की गृह बंधित हो गया है और भैरव की ऊर्जा का बवंडर देख वो दोनों कांपने लगे। तुरंत अनिल के पास पहुंचे और वहां अपने पुजित देवताओं को बुलाने लगे। अब भी हार नही मानना था इन्हें। लेकिन यह सब कौन कर रहा है यह विचार करने हेतु भी इन दोनों के पास समय नही था। काला मुर्गा जो प्रियांशु लाया था उसको लक्ष्य करके अपने दाहित वचन शक्ति को चला दिया रोहित ने। कामाख्या वचन के मान हेतु भैरव ने प्रवेश दे दिया और क्षण भर में प्रियांशु रक्त वमन कर उल्टा गिर पडा़ भूमि पर। रोहित के क्रोध में थोडी़ शांति आयी। इससे पहले की ये दोनों कुछ समझ पाते उधर इष्ट शक्ति का इशारा पाते ही संजय ने दो बाण एक साथ छोड़ दिये। एक तो प्रियांशु के अभिचार को क्षण में काट डाला दुसरा तुरंत विपरीत कर दिया अभिचार को।
यह जो बार बार पुरे परिवार पर इतना उठा पटक चल रहा था। यह इतना साधारण प्रयोग नही था। दोनों दल अपनी तंत्रोक्त शक्ति सिद्धि का भरपूर प्रयोग कर रहे थे। एक साधक अपने साधना का बल भक्षण हेतु तो दुसरा रक्षण हेतु।

बलराम देवराज प्रियांशु कोई भी कुछ नही। समझ पा रहा था की यह क्या हो रहा है। एक पल में ठीक और अगले पल में चित्त।
अब रामभुवन और रोहित अनिल से बोले की घर पर पुनः भैरव बंध लग गया है। आधे से अधिक हमारे समान तो अंदर ही बंध गये।और सभी तंत्र वापस पलट रहा है क्या किया जाये।
इसके उपाय हेतु अनिल ने अब कहा की ब्रह्मराक्षस का प्रयोग करो अब। और समाप्त करो इन सबके किस्सा का।
खाट बिछाकर उसपर सफेद आसन लगा आवाह्न होने लगा पिशाच जोडे़ं का। पर वे तो अंदर फंस गये थे और मसान को खंडहर में भुवन ने ही रोक रखा था।
अब अपनी चोरी पकडी़ ना जाये इसलिये भुवन ने कहा मैं इनके मुल स्थान से जाकर बंधन खोलता हूं, ये जैसे आयें तुम तुरंत मारण चालन कर देना। अब ये लोग शमशान हांडी का प्रयोग करने हेतु तैयारी कर लिये थे।
भुवन वहां पहुंच कर मसान को खोला और पिशाच जोडे़ को लेने हेतु अपने कुछ सिद्ध वचन वीरों के साथ बलराम के घर पर भेजा।
इधर संजय को तुरंत खबर मिला और वह अपने सिद्ध दंड पर प्राप्त मर्कट अंश का प्रक्षेपण कर बलराम के घर में पुनः सबको बांध लिया।
इससे पहले की भुवन और रोहित और कुछ करते संजय तेजी से पहुंचा बलराम के घर और बाहर पूजित पिशाच पिंड को तुरंत तंत्रोक्त बंधन में लिया। उसको बलि देकर स्थान से हटा तुरंत शांत किया। स्थान शुद्ध कर क्षण में वहां भैरव पाषाण स्थापित कर त्रयोदश खंड द्वीप प्रज्जवलित कर दिया। अब थी बारी अंदर के महाघमशान की। संजय ने एक एक कर आधे से अधिक अभिचारों को निकाल कर हांडी पर उठा लिया। और पिशाच जोडे़ को मसान के साथ भुवन के पास भेज दिया। घर खाली होते ही मर्कट अंश ने तुरंत स्थान को अपनी लपेट में ले लिया।
अंदर अब बलराम का परिवार संजय के साधना की शक्ति से संरक्षित थे, बस बाहर ना आये ये लोग।
उधर भुवन के पास आते ही पिशाचों को तुरंत रोहित के पास भेज दिया। रोहित तैयारी कर के बैठा था, हांडी पर वचन में लेकर तीनों को बलराम के परिवार पर मारण हेतु चला दिया। इधर संजय ने इशारा पाते ही तुरंत अपनी हांडी को चला दिया और साथ में ही बाकी बचे बाणों को भी प्रक्षेपित कर दिया।
हांडी बीच में ही टकराकर खत्म हो गये और लाग स्तंभित हो गया। इधर बाण से मुक्त हुये पिशाच उलट गये और सबसे पहले पहुंचे खंडहर। बाकी भुवन तैयार होता इससे पहले ही गर्दन मरोड़ दिया गया उसका। उसी चबुतरे पर छटपटा कर प्राण निकल गया जहां से वह ले गया था स्वर्ण मुद्रायें।
इधर रोहित तुरंत अनिल और परिवार के साथ कामाख्या कवच से गृह को बांध लिया ताकी पलटवार का प्रभाव ना पडे़ लेकिन विधाता का खेल निराला, ऐन वक्त पर उसकी पत्नी रजस्वला हो गयी और रक्त की बुंद उसके कपडे़ और आसन से रिसते हुये उसके मंडल से सटे भाग में जा लगे। लगते ही बचन बंधित सात्विक देव स्थान छोड़ दिये। कवच क्षण में टुट गया और रोहित भी अशुद्ध हो गया।
यहां यह साधिका नही थी ना ही यह शोधित थीं ऊपर से इन सबके कर्म नीचता की पराकाष्ठा पर थे। यही स्त्री देव मर्कट भैरव को जूठा लाग लगवाई थी और यही स्त्री आज अपने परिवार के नाश का माध्यम बनी।
ब्रह्मपिशाच तो नही प्रवेश कर सका रोहित के घर पर डाकिनी ने क्षण में ही रोहित को लील लिया। मुंह से तब तक खुन बहा जब तक प्राण ना निकल गये।
यह रामभुवन की सिद्ध हाडी़ में चलाई गयी डाकिनी थी।

इन दोनों का अंत होते ही संजय ने पुनः शमशान की ओर प्रस्थान किया और सारी पुजा संपन्न की। समस्त शत्रु मसानिक शक्तियों को शांत करके विसर्जन हेतु वहीं बंधन कर दिया ताकी वे सब पुनः बलराम को परेशान ना करें।
घनश्याम, रचना और मसान को शमशान शिव मंदिर के पास स्थित पाकड़ के वृक्ष पर बंधित कर दिया एक पक्ष के लिये। और शांति विधान कर स्थान पर लौट गया।

इधर अनिल का रो रोकर बुरा हाल।
बलराम देवराज सब कोई राहत महसुस कर रहे थे।अब इतनी रात वे लोग कहीं गये नही। सभी एक साथ ही बैठकर रामभुवन और रोहित की प्रतिक्षा कर रहे थे।

सुबह होने पर सभी घर की साफ सफाई कर नहा धो अपनी अपनी पुजा पर बैठ गये। रक्त पाषाण को वापस देख सबने सोचा दुबारा भुवन ने स्थापित किया होगा।
6 बजे अनिल की बहु रोते रोते आयी और अपने पत्ति की मृत्यु का जिम्मेदार इस परिवार को बता दहाड़ मार कर रोने लगी। सभी गयें वहां और फिर ढांढस बंधा कर अंतिम संस्कार हुआ।।
बलराम का परिवार सत्यता से अनिभिज्ञ स्वयं को ही दोषी मान रहे थे। कि इनके कारण रोहित की मृत्यु हो गयी।
अब मृत्यु सूतक तो लग चुका था। सब लोग सामान्य होने के प्रयास में थे। उधर अनिल तीन दिन हो चुका था रामभुवन को खोज रहा था। अपने प्रतिशोध की अग्नि में दहन कर चुका संतान को अनिल प्रेत योनी में फंसने नही देना चाहता था । उसे काफी प्रश्नों के उत्तर चाहिये थे जो केवल रामभुवन दे सकता था। 5 दिन बीतने के बाद हो हल्ला हुआ की खंडहर में लाश मिली है। पुलिस ने पंचनामा बनाकर भेज दिया। पता चला की यह व्यक्ति अनिल के घर पर था। इधर पुछताछ आरंभ हुई।
उधर बलराम के घर पर सभी सकते में थे की यह दो मृत्यु हम सबके कारण हुये हैं। पुलिस के पुछताछ के दौरान अनिल पर संदिग्ध आरोप लग रहे थे। घर पर छापे मारी हुयी जिसमें रामभुवन के लाये गये कयी आपत्तिजनक दुलर्भ तंत्र सामग्री प्राप्त हुई। कंकाल दंड भी मिला जो किसी जानवर के रीढ़ की हड्डी से बनता है। पूरे गांव में हल्ला हो गया अनिल को लेकर। डीह पर रोहित को तंत्र मंत्र करते भी देखा था सबने और बलराम की बेटी की स्थिति सबको पता था। पुरा गांव इन दोनों परिवार से दरकिनार कर गया। दुर्लभ तथा संरक्षित जीव का अवशेष तरस्करी के आरोप में अनिल को पुलिस उठा ले गयी। जेल में ही उसने फांसी लगा कर आत्महत्या कर ली।

उधर संजय ने गुरु आज्ञा से शमशान स्थित मर्कट भैरव के क्षेत्र में ही 6 मास के लिये ब्रह्मपिशाच,डाकिनी और मसान को बंधित कर दिया।

जब किसी भी पुरुष अथवा स्त्री पर लगातार विभिन्न प्रकार के जटिल तंत्रोक्त प्रयोग होते हैं तो उसके प्रभाव से भी उसकी अवचेतन आंखे यानि तिसरा नेत्र खुल जाता है,  इस घटना में शालिनी के साथ यह हुआ और चुंकी वह इन ऊर्जाओं के समन्वय का सबसे बडी़ माध्यम बनी उसकी पिनियल ग्रंथी सक्रिय हो गयी और वह इस पुरे घटनाक्रम को देखने में सक्षम थी। लेकिन चुंकी वह पैशाचिक शक्तियों के प्रभाव में थी तो वह समझ ही ना सकी उस समय की यह सब आखिर भ्रम है या सत्य। कुछ मास पश्चात जब सब कुछ सामान्य हो चला तब देवराज का मित्र घर आया और सारी सत्य बातों से अवगत कराया। शालिनी इस बात की साक्षी बनी और उसने ही इस तंत्र युद्ध के कितने ही प्रपंचों को बता दिया। ब्रह्म का बंधन क्षेत्र तक बता दिया।
तब बलराम को अपनी गलती और अनिल के छल का पता चला और फिर सेवक संजयनाथ के पास जाकर सभी ने क्षमा मांगी। संजय ने तो अपना कर्त्तव्य निर्वहन किया था। उन्होंने आगे की रुप रेखा तैयार की और फिर घनश्याम,रचना और अबोध बच्चे को गया,बद्री,विन्ध्याचल इत्यादि क्षेत्रों में मुक्ति हेतु श्राद्ध तर्पण और अनुष्ठान इत्यादि करवाकर इस योनी से मुक्त किया।
ब्रह्म को विन्ध्याचल के तारा पीठ में स्थान देकर वहां से मुक्त किया गया।
संजय के मार्गदर्शन में यह परिवार आगे बढा़। इस घटनाक्रम ने सबकी जीवन में अनेक बदलाव लाये। शालिनी और प्रियांशु दोनों शाक्त दीक्षित हो संजय के मार्गदर्शन में अनेक साधनाऐं कियें। प्रियांशु घर छोड़ कर पूर्ण अघोर संप्रदाय में चले गये हैं। तरकुलहा देवी के स्थान और गुरु गोरखनाथ के सिद्ध पीठों में अक्सर दिखते हैं। शालिनी और विनिता दोनों का विवाह उपरांत देवराज का विवाह हुआ। देवराज पुर्ण सद्गृहस्थ हैं और भगवती महाकाली के अनन्य उपासक साधक बन चुके हैं।

अनिल का वंश अभी भी चल रहा है , भविष्य के गर्भ में इस घटना का फिर कोई उद्बोधन होगा!! या यही समाप्ति है। या पुनः वंशज आकर फिर करेंगे कोई नया प्रपंच!!!

इस सत्य घटना को यही विराम देता हूं। आशा करता हूं भगवती सरस्वती की कृपा से इस रचना ने आप सबको बांध कर रखा होगा। आप सभी को यह पसंद आया होगा। आगे साथ बने रहे। शीघ्र ही नयी रोचक कथा के साथ आपके समक्ष उपस्थित होउंगा।

आप हमारे चैनल गृहस्थ तंत्र एवं सिद्ध शाबरी विद्या पर इस विषय से संबंधित विभिन्न जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।

इति श्री

श्री विन्ध्यवासिनी शरणं मम्।।
-रूद्रांश