Grihasth Tantra

ब्रह्मपिशाच प्रपंच भाग-4

रोहित प्रतिघात का आरंभ करने की तैयार कर चुका था। कुछ समय के लिये पुनः वह कामरु प्रदेश चला गया। वहां के तंत्र पीठ में अपनी द्वारा वचन बंधित शक्तियों को जाग्रत कर हर एक को बलि द्वारा पोषित किया। अपने तंत्रोक्त मंत्रों को पीठ के वाम भाग पर जाकर बलि सहित पीठ अधिष्ठात्री को समर्पित किया पुनः उनको स्वयं ग्रहण कर तेज पूर्ण किया।
एक एक तंत्र की क्रियायों को धार दे चल पडा़ अपनी गंतव्य की ओर जहां उसे रचना था प्रपंच और लेना था अपनी पिता की माता यानी दादी की हत्या का प्रतिशोध।
वापस गांव आकर रोहित ने सर्व प्रथम कुछ दिन आराम किया ताकी इस लंबे युद्ध में थकान ना आये।
अब इसका पहला कार्य था जितने भी बंधन किये गये हैं सभी बंधनों को तोड़ना ताकी सुरक्षा घेरा खंडित हो सके।
बुढे़ ब्राह्मण द्वारा उसे भेद मालूम था की बंधन किस शक्ति की है और उनकी क्षमता क्या है। इस बंधन को तोड़ने हेतु उसने अपने एक मुस्लिम साधक मित्र की सहायता ली।
असगर नाम के युवा तांत्रिक ने इसमें रोहित की पूरी सहायता की। वह मुस्लिम इल्म का जानकार था।
वास्तविकता यह थी की उसके माध्यम से इन बंधन की शक्तियों को भ्रष्ट करना था ताकि अपवित्रता के कारण शक्ति का पाश छुटे और बंधन तोड़ने का समय मिले रोहित को।
जुमा रात को दोनों साथी गांव के क्रब्रिस्तान पहुंचे। वहां असगर ने एक ताजा क्रब्र जो 2 दिन का होगा उसके ऊपर कलमा पढ़ कर राई छीटे। फिर कुछ आयत पढ़ कर केवडा़ जल से पुरे क्रब्र को सींच दिया।कब्र पर हरा कपडा़ चढा़ कर  उसके चारों तरफ 13 चिराग जलाकर पुनः वुजु करके अपने आसन पर बैठ गया। रोहित कब्र से कुछ दुर खडा़ सब देख रहा था। असगर आसन,शरीर,दिशा बंधन करने हेतु कोई मुस्लमानी मंत्र पढ़ कर फुंका फिर बैठ कर किसी शक्ति का आवाह्न करने लगा।
अगले 5 मिनट के बाद कब्र के आस पास अजीब सा भारीपन छा गया और फिर एक स्त्री शक्ति वहां आयी जिसे देखने में रोहित भी सक्षम था। यह बेला जिन्नात थी। असगर ने हवा में कुछ भोज्य पदार्थ उछाले जो वापस भूमि पर नही गिरे। इसका अर्थ था बेला को सौंपा गया कार्य उसे स्वीकार्य था।
अब बेला के माध्यम से असगर ने पहला प्रयास किया मस्जिद के खंडहर में स्थित बंधन को तोड़ने में। बेला जिन्नात एक क्रुर तामसी मुसलमानी शक्ति है जो केवल गलत कामों में ही सहयोग करती है। इसका भोग इतना खराब चीज है जिसका उल्लेख यहां करना उचित नही होगा। बेला अपने साथ कुछ पीरों को जोडे़ में रखती है। ये सब मिनट मिनट में जगह बदलने में माहिर होते हैं।
ये सारे मस्जिद की ओर चले गये। वहां जाकर उन्होंने बंधित शक्ति का आंकलन किया और असगर को सूचित किया। असगर तैयार था एक जीव का बलि देते ही मस्जिद स्थित घनश्याम की जीवित चित्ता समाधि के चारों ओर के बंधन टुट गये। अब स्वर्ण त्रिशूल को हटाना था। उसके लिये रोहित के हाथ से गोरोचन मिश्रित गोमूत्र को अभिमंत्रित कर पहले जाग्रत शूल को शांत करने का प्रयास किया असगर ने। जो नही हुआ। बंधन अभी भी तीव्र था। असगर ने चाल चली और बुढे़ ब्राह्मण द्वारा सिखायी गयी विधि से रोहित द्वारा ब्रह्म को ऊपर किया गया और रक्त बलि दिया गया। उस क्षण में ही अहगर ने निषिद्ध पशु मांस को मुस्लमानी मंत्र से अभिमंत्रित कर चबुतरे पर फेंक दिया। जिससे वहां उपस्थित शुभ शक्तियां हट गयीं और फिर पीरों द्वारा तुरंत बंधन तोड़ दिया गया।

लेकिन अति आत्म विश्वास से लबरेज असगर ने बहुत बडी़ गलती कर दी। क्योंकी वह बंधन शक्ति भैरव की थी और बंधित शक्ति ब्रह्म था। तो निषिद्ध प्रयोग को करने के कारण पहर बीतते बीतते असगर की सारी सिद्धि कुंठित हो गयी। वह देखने सुनने तक की विद्या गवां बैठा।
दुसरी गलती चबुतरे के नीचे भस्म एक वेदपाठी ब्राह्मण का था जो स्वयं एक तांत्रिक भी था और इतने सालों से बलि स्वीकार कर चुका था। उसका स्थान दुषित होने के कारण वह दुगुना वेग असगर को निपटाने झपटा लेकिन प्रतिबंधित रक्त का लेपन कर असगर शरीर सुरक्षित रखा था। ब्रह्म स्वयं को असुद्ध नही करना चाहता था इस हेतु वह स्पर्श नही किया। किंतु साथ में खडी़ डाकिनी के लिये यह बायें हाथ का खेल था और अगले ही पल असगर कुछ समझ पाता उसका गर्दन एक ओर लुढ़क गया।

रोहित का दिमाग जैसे तैयार था उसने उसके बाद तुरंत ही अपनी शक्तियों के द्वारा पुरा जोर लगाकर इन तीनों को विशेष यंत्रों में बांध लिया और वहां से निकल गया।

घर ले जाकर सुनियोजित स्थान पर उन्हें बंधित कर दिया।
अगली सुबह रोहित ने पीपल के वृक्ष पर लेजाकर तीनों को स्थान दिया। पीपल का वह वृक्ष किसी के द्वारा पूजित नही था। वहां बांध कर वह आगे की तैयारी करने लगा। दोपहर में गांव भर में हल्ला हो गया की मस्जिद के खंडहर में कोई लाश पडा़ हुआ है। पुलिस आ कर ले गयी। कोई सबुत तो था नही। जो सामान बिखरा था उसको रोहित सलीके से समेट चुका था।
वह अपने मित्र के मृत्यु से तनिक भी आहत नही था। उस समय सभी के पास मोबाइल हुआ नही करता था की कोई सुराग हाथ लगता।
फिर भी अगले 1 सप्ताह तक रोहित भय के अवसाद में रहा की उस हत्या के मामले में ये फंस ना जाये। 1 सप्ताह बाद निश्चांत हो वह अपनी तंत्र प्रक्रिया शुरु की। पहले धूना को जगा कर उस पर ब्रह्म और डाकिनी को बुलाया तथा अपनी सिद्धि के बल पर उनको वचनों में लिया। यद्यपि वे दोनों इसके ही तरफ थे और उन दोनों का प्रतिशोध ही यह ले रहा था लेकिन तंत्र में वचन की मर्यादा रखी जाती है इस हेतु उसने वचन करना उचित समझा। अब जो तिसरा कच्चा मसान ब्रह्म था वह वचन में नही आया। उस पर नियंत्रण हेतु रोहित ने उन दोनों को ही धार दे दिया। अब वह तीन प्रचंड शक्ति और साथ में रोहित की पिशाच सिद्धियां तैयार थी  वार हेतु।

बलराम की घर की सुरक्षा हेतु स्थिपित मर्कट शक्ति के पुरे बंधन को तोड़ना अभी बाकी था जिसके हेतु रोहित ने अपनी तंत्र विद्या का उपयोग उचित समझ कर अपने कामरू सिद्ध शक्ति का आवाह्न किया। विभिन्न प्रकार की उपदेव शक्तियों में एक शक्ति आती है मरी। मरी को सिद्ध करना जितना मुश्किल है उतना ही उसका प्रयोग और निवारण भी। मरी जाग्रत शमशान की मारक शक्ति होती है। रोहित ने बंधन विच्छेद हेतु मरी को पठाया। लेकिन मरी वापस लौट आयी। क्योंकी मर्कट भैरव कोई कच्चा कलवा नही  थे जो मरी बांध लेती।
अब रोहित ने गुरु प्रदत्त यक्षिणी गुटिका का प्रयोग किया। इसने शमशानिक यक्षणियों को साधा था। उन सबको चालन करने पर वे भी मर्कट भैरव की सीमा लांघ ना सकीं। अब रोहित का धैर्य क्रोध में बदल रहा था।
जहां दंड साथ नही देता वहां भेद की युक्ति लगानी चाहिये। और उसने वही किया।

जिसके शरीर से शक्ति सिद्ध होती है उसके शरीर के हेतु अपने नियम बंधन होते हैं। जैसे सात्विक शक्ति का साधक जल्द शमशान भूमि नही जाता वैसे ही तामसिक शक्तियों के साधक शुभ रक्षित स्थानों में नही प्रवेश करते। ऐसे में दोनों के विपरीत स्थान उल्लंघन के कारण शक्ति कुंठित होती है तथा उनका प्रभाव जाता रहता है। उल्लंघन के अपने नियम होते हैं जैसे पैर की मिट्टी मंत्र से बांध कर सुरक्षित रख कर जायेंगे।

अब रोहित भी बलराम के घर नही जाता था। हां उसकी पत्नी जरुर जाती और बलराम के घर कोई भी इनपर किसी तरह का शक नही करता था क्योंकी ये लोग बहुत लगाव और स्नेह प्रदर्शित करते थे।

मर्कट भैरव की सीमा में अगर अन्य भैरव की लाग चल जाये तो उससे नाराज मर्कट भैरव स्थान से प्रभाव कम कर लेंगे। ऐसी योजना बनाकर रोहित ने नगर भैरव की दंडी पुजा कर वहां की लाग अपनी पत्नी के द्वारा बलराम के घर भिजवा दी। और उसका कुछ अंश उस लोटे में डलवा दिया जिससे बलराम या देवराज शमी वृक्ष के नीचे प्रतिदिन मर्कट अंश को धार देते थे।
जुठा धार पड़ने से अंश शक्ति स्थान से तब तक के लिये स्वतः हट जाती है जब तक पंचगव्य से स्थान शुद्ध ना हो और गुगल इत्यादि से वातावरण शुद्ध ना हो।
अब जब किसी को पता ही नही की जूठी लाग चढी़ हुई है कोई कैसे स्थान शुद्ध करे।
उसी में सब पूजा करते रहे और तीन दिन तक पूजा खराब होने के पश्चात रोहित ने मर्कट भैरव को क्षेत्रपाल के स्थान पर धार देकर आवाह्न कर दिया तथा विभिन्न प्रकार से पूजित कर वहीं वचन से रोक दिया।

अब जहां जहां मर्कट कील गाडा़ गया था और कपाल स्थापित था, वहां वहां पूजा देकर सभी कील को शांत कर दिया रोहित ने और फिर उचित समय देखकर कपाल को निकाल लिया।
शमशान लेजाकर खप्पर पूजा देकर मर्कट भैरव का विसर्जन कर दिया तथा सिद्ध कपाल की शक्तियों को भी धार इत्यादि से शांत करने उनके धाम भेज दिया। अब अंतिम रूप से कपाल भंजन कर चित्ता अग्नि पर उस मर्कट कपाल का अंतिम संस्कार कर दिया।💀💀💀

समस्त स्थापित शक्तियों को उठाने और हटाने में बहुत सजग रह कर रोहित ने कार्य किया। इन सबके बाद अपने इष्ट शक्ति को 7 छाग बलि शमशान की चित्ता पर अगले सात दिनों तक देकर उन्हें शांत एवं प्रसन्न किया। मर्कट भैरव को हटाने और उनकी शक्तियों को शांत करने में बहुत ही सावधान रहना था। जरा सी चूक और प्राण जाने का भय। अपने इस सफलता पर रोहित बहुत ही प्रसन्न था।
अब अगली बारी थी घर के भीतर स्थापित इनके कुल शक्तियों को रोकना। उसके लिये रोहित ने क्षुद्र मसानिक शक्ति का सहारा लिया। और अभिमंत्रित शमशान भस्म को अपनी पत्नी के माध्यम से बलराम के घर पहुंचवा दिया। उसकी पत्नी ने भस्म को पूजा घर में देवपूजन के निमित्त प्रयोग होने वाले चंदन में मिला दिया।
अगले दिन जैसे ही वह चंदन देव विग्रह पर लगाया गया। समस्त देव शक्ति अपवित्र लेपन के स्पर्श से पलायन कर गयीं। उनके स्थान छोड़ते ही घात लगाकर बैठे रोहित ने ग्राम देव के पास उन्हें धार देकर रोक लिया। और मसानिक शक्तियों को प्रेक्षित कर दिया बलराम के घर।
अब बलराम का पुरा घर एक तरीके से रोहित के तांत्रिक षडयंत्र में फंस चुका था।
धीरे धीरे रोहित ने अपनी मसानिक शक्तियों को बलराम के घर में प्रबल करना शुरु किया। वह चाहता था की बलराम के घर के लोग ऐसे ही ना प्राण त्यागे बल्कि उनकी सामाजिक आर्थिक हत्या हो, मान सम्मान में सेंध लगे फिर समाप्त हो।
जब इसकी तंत्र मसान शक्तियां अच्छे से बलराम के घर पैठ कर गयीं तब आहिस्ते आहिस्ते परिवार के सदस्यों पर रोहित ने घात आरंभ किया।
होलिका दहन की रात्रि में उसने अपने द्वारा प्रेषित सभी मसानिक क्रियायों को चालित कर दिया था।
उस घर के प्रत्येक सदस्य पर कोई ना कोई मसान की लाग लगी हुयी थी। बस शालिनी पर रचना की प्रेत शक्ति थी जिससे की वह सबसे ज्यादा प्रभावित हो गयी थी। बाकी लोग भी रोहित के हद में थे वो जब चाहे सभी के साथ छेड़ छाड़ कर सकता था।
यह सारी जानकारी देने के बाद यक्षराज सिद्धेश चुप हो गये। संजय ने गंध पुष्ष एवं विशेष सुरा द्वारा धार देकर उन्हें प्रसन्नता पूर्वक विदा किया। कुछ देर आसन पर बैठ कर विसर्जनी मुद्रा से ऊर्जा विसर्जन पश्चात आगे की तैयारी में लग गया। अब सारे रहस्य अनावृत हो चुके थे। ब्रह्मपिशाच  को तो संजय स्वयं ही बांध लाया था। अब करना था इस षडयंत्र का भंडाफोड़ और ले जाना था परिणाम तक।

संजय अगली सुबह सवेरे अपने साधना स्थली पर बैठे और आरंभिक क्रियायें पूरी की। सुबह की पूजा अपने इष्ट को निवेदन किया।
अब आगे की प्रक्रिया आरंभ की।।
हाथ में रक्त जावा पुष्प लेकर यक्षलोक की सुरा सुंदरी यक्षिणी का आवाह्न आरंभ किया।
यक्षिणी अपने आप में एक क्रोध युक्त प्रचण्ड शक्ति है। आसाम के कामरूप में संजय ने भी 5 वर्षों तक विभिन्न तंत्र शक्तियों की साधनाऐं संपन्न की थी। उनमें से एक थी सुरा सुंदरी यक्षिणी। साथ में वैदुर्य वीर जैसे घातक शक्तियों को भी सिद्ध कर रखा था। आज इन सभी का आवाह्न कर रहा था संजय।
रक्त पुष्प को भुतनी मुद्रा से जैसे ही समर्पित किया सुरा सुंदरी समक्ष पटल पर आ गयी। सुरा का अर्घ्य दे प्रणाम किया तथा आज की तंत्र युद्ध में सहायता हेतु प्रार्थना किया।
बंधन पुर्ण करके ब्रह्म पिशाच को पुनः खोला तथा उससे अंतिम बार वार्ता की।
पिशाच के मुक्ति हेतु तथा अन्य साथ की प्रेत शक्तियों की सद्गति हेतु बार बार कहा।
संजय ने कहा की आपके साथ जो भी हुआ वह बिल्कुल सही नही था। आपकी हत्या करने वाले तो घुट घुट कर मरें। अब आप कृपया अपने प्रतिशोध को रोक दें। रोहित आपका ही औरस है। आप ही इस पुरे अभिचार में प्रमुख हैं। आप मान जाईये तो मैं आपको रचना को तथा नवजात बाल ब्रह्म तीनों के सद्गति हेतु गया, काशी,बद्री तथा पुष्कर क्षेत्र में कर्मकांड संपन्न करवा दुंगा। आप अगर शक्तिपीठ में स्थान चाहें तो कालीघाट,तारापीठ या कामाख्या में स्थान दे आपको वहां शांत करवा दूं।
भीषण ब्रह्म दांत कटकटा उठा। तु मुझे मुक्त करेगा। नही होना मुझे मुक्त। जब तक इन हत्यारों के वंश का एक भी अंश जीवित है मुझे शांति नही मिलेगी।
संजय-  इन सबका क्या दोष? ये तो कहीं से भी आपको तकलीफ नही देते, फिर क्यों ??
क्रोधित पिशाच चीख उठा💀💀💀💀💀
गलती करते समय कोई नही देखते लेकिन शाप कुल के वंशज भुगतते हैं। जैसे एक पुण्यात्मा का पुण्य उसके सात पीढी़ तक को संरक्षित करता है वैसे ही मुझ निरपराध ब्राह्मण की निर्मम हत्या करने वाली की पीढि़यां रक्त की आंशु रोती रहेंगी।

रक्त बलि प्राप्त होते रहने के कारण ब्रह्म भीषण उग्रता को प्राप्त एक खुनी ब्रह्म हो चुका था।
बात से मार्ग ना निकलता देख संजय ने पुनः पिशाच को आबद्ध कर दिया।

अब संजय को हर एक बात बलराम और देवराज को बतानी थी। इसके लिये उपयुक्त स्थान उसने एक शिव मंदिर को चुना। नियत समय पर वे दोनों आ गये।
संजय ने एक एक घटना विस्तार से उन्हें बतायी तथा वर्तमान परिस्थिति से अवगत कराया।
कोई भी साधारण व्यक्ति इन बातों को कभी नही मानेगा। उसके मन में अधिक से अधिक यही आयेगा की यह तांत्रिक साधक पैसे बनाने के चक्कर में है और उसी के लिये इतना डरा रहा है।
यही बलराम के साथ भी हुआ। उसने सामने से तो कुछ भी नही कहा। बस दो दिन का समय मांगा ताकी आगे क्या करना है वह सोच सके।
संजय से उसने इसका मार्ग तक नही पुछा क्योंकी उसने सोचा अगर मार्ग पुछा तो क्रिया और पूजा के नाम पर लंबा चौडा़ खर्च पहले बताया जायेगा। और जितना यह बता रहा वैसा है नही कुछ। यह अविश्वास बहुत भारी पड़ने वाला था बलराम को। बाप बेटे घर लौट आये।
अधिकांश लोगों के साथ यह होता है की साधक अगर घट घट की बात बता दे तो पीडित सोचता है यह सब झुठमुठ की बात पैसे बनाने के लिये बोल रहा है।

घर आकर दोनों आपस में विचार विमर्श करते हुये संजय के एक एक बात को झुठा करार देने लगे।
अनिल को लेकर दोनों के मन में छवि साफ थी क्योंकी अनिल बहुत वफादारी से रहा था और मौके पर सदैव खडा़ रहता था। रोहित और उसकी पत्नी भी सदैव एक पैर पर खडे़ रहते थे। तो शक की कोई गुंजाइस नही थी।

हां लेकिन शालिनी की स्थिति जो हुई थी उससे कुछ सतर्क जरुर थे लेकिन अनिल रोहित पर शक बिल्कुल नही था।
शत्रु को अगर बिना मौका दिये मारना हो तो पहले उसके विश्वास को जीतना पड़ता है। विश्वास घात कर मारने से शत्रु संभल भी नही पाता। ना ही उसकी बुद्धि इतनी साथ देती है की वह अपने विश्वासी पर संशय करे। यही यहां हो रहा था।
बलराम आगे पीछे सोचे बिना अनिल को बुला लिया। और उसे सारी बात बताईं। अनिल सारी बात सुनकर घडियाली आंसु निकालना आरंभ कर दिया। रोते रोते कहा इतना कपट है आप सबके मन में, मैंने सदैव आप सबका साथ दिया और आप सब यह लांछन लगा रहे हैं। बलराम को तो पहले से ही अंधा भरोसा था। यह आंसु उसके विश्वास पर पक्की मोहर लगा दिया।
बलराम ने कहा पहले जो कुछ भी हुआ हो, जो आप जानते हो या जो मैं लेकिन उन सबका अब कोई लेना देना नही है। आपसे हमेशा साथ की अपेक्षा थी भैया।
अनिल ने कहा मैं हमेशा साथ हूं आप चिंता ना करें।
यह समस्या जो भी है और जिस भी कारण है हम लोग मिलकर इसका निराकरण करेंगे। आप चिंता ना करें। मेरे मित्र रामभुवन  जी हैं कलकत्ता के उनको बुलवाने का प्रबंध करवाते हैं। वो इस क्षेत्र में काफी अनुभवी हैं।
इस तरह के बातें बनाकर अनिल ने अपने पहलु को और मजबूत कर लिया। और साथ ही अपनी एक मसानिक खिलाडी़ सेवडा़ को निमंत्रित करने का आदेश भी ले लिया।

उधर संजय इन सबसे अनभिज्ञ एक पुण्य अर्जित करने हेतु अपनी साधनात्म शक्तियों को जाग्रत एवं आमंत्रण दे रहा था। तभी उसका तेली मसान वहां पहुंचा।
पाठकों पुनः याद दिला दें की जब ब्रह्मपिशाच को बांध कर संजय अपने तंत्र स्थली पर लाया था उस समय पिशाच ने हंस कर कहा था तुम्हारा मसान क्यों नही लौटा।
और संजय चुप रह गया था। जिस बंधन को पिशाच अपनी विजय समझ रहा था वास्तव में वह एक निपुण तंत्र साधक की चाल थी। तेली मसान वहां बंध कर हर एक जानकारी एकत्रित कर रहा था।
रोहित को भी मसान बंधन की जानकारी थी लेकिन अतिविश्वास और अपने हर चाल को सफल समझ कर ज्यादा महत्व नही दिया था। सोचा गांव के शोखा ओझा इतनी शक्ति तो रखते ही हैं। यह मसान तो बंधा हुआ है रहने दो। शत्रु को कम आंका उसने। उचित समय पर बंधन तोड़ मसान उड़ चला महाकाली की सेवा में।
तंत्र स्थली पर आते ही चित्कार किया संभल सेवक संभल तुझसे ही विश्वास घात की तैयारी हो रही है। और वहां घटित सारी घटना बता दी।

तंत्र क्षेत्र में कोमल हृदय का साधक अगर प्रवेश करता है तो उसके लिये कदम कदम पर कठीनाईंया होती है। क्योंकी वह तंत्र क्रिया, शक्ति , पीडित पक्ष , पीडित शक्ति सभी से भवानात्मक रूप से जुड़ जाता है और सभी का भला करना चाहता है। मेरे आंकलन से भी महादेव वर प्राप्त नक्षत्र के जन्म लेने वाले साधक तंत्र क्षेत्र में सफलता तो उच्च स्तर की हासिल करते हैं लेकिन लोक कल्याण की भावना रखने पर भी छल का दंश उन्हें सदैव दुखी कर देता है और अंततः वह एकांत वासी साधक हो जाते हैं।

संजय भी भावद्वेलित हो गया। सारी बातें जानकर।
एक तरह से उसका कुछ नही बिगड़ता लेकिन पीडित परिवार शत्रु द्वारा रचित षड्यंत्र में फंस चुका था।
आगे की बात करने हेतु बलराम के घर से कोई आया ही नही। मनः स्थिति से थका संजय अपने नित्य पूजन पर लग गया।

उधर 3 दिन बाद रामभुवन पहुंच गये सिवान।
इतने दिनों तक जबसे संजय बांध कर ले गया था पिशाच को शालिनी थोडी़ सामान्य थी। उसपर बाकी दो शक्ति भी हावी थी लेकिन प्रभाव कम था।
रामभुवन अनिल के घर पहुंचा। वास्तव में वह मध्यम उम्र का साधक रोहित का गुरु भाई था जो 15 साल बडा़ होगा रोहित से। उसे भी रोहित और अनिल की जानकारी थी की वे क्या चाहते हैं और वह स्वयं पैसे का महालालची इनके साथ था।
धुर्जट,कामल,हादी,लंगत इत्यादी जितने भी जंगली वनवासी  मसानिक प्रयोग होते हैं उसमें इसे महारत हांसिल थी। रोहित ने इससे बहुत कुछ सीखा था।
एक बंद कमरे में मुर्गा शराब के भोग के बाद तीनों ने मिलकर आगे की रणनीति बनाई और सब कुछ क्रियात्मक रुप से करने हेतु कुछ सामान्य परीक्षण भी किया।

रात्रि को तय समय पर तीनों बलराम के घर पहुंचे। अनिल ने राम भुवन से सभी का परिचय करवाया। तंत्र सामग्रियों का प्रबंध रोहित ने कर रखा था और वे लोग पुरी तैयारी से पहुंचे थे। एक कमरा पहले से ही खाली करवाकर दरी बिछा दिया गया था। वहां रोहित ने सारे सामान को क्रमबद्ध रखकर तैयारी कर ली।
सामने शालिनी को बैठाकर रामभुवन ने मंत्र पढकर भस्म फेंका। शालिनी खेलना आरंभ कर दी। जोर जोर से हुंकार लेती हुयी झुलने लगी।
सभी लोग स्तब्ध थे। कमरे में बलराम,देवराज,प्रियांशु,उनके दोनों मामा,शालिनी की बहन विनिता सभी मौजुद थे। पिछले कुछ दिनों में इतनी घटनाऐं घट गयीं थी की हर कोई चिंतित था।
रामभुवन ने पुछना आरंभ किया कौन है तुम और क्यों इस परिवार को परेशान कर रहे हो?
शालिनी- मेरा पूजा नही दे रा ये लोग इसलिये💀
भुवन- कैसा पूजा??
शालिनी- मेरा दिया जलता है इसके घर के बाहर लेकिन भोग नही देता है ये लोग। कितने ही साल से इस घर को बचाते आ रहे हैं लेकिन दिया के सिवाय कोई भोग नही मिलता।
भुवन- तो इनके घर के देवता हो?
शालिनी- चिल्लाते हुये तो क्या बाहर से आयेगा कोई यहां। किसी का हिम्मत नही जो इस घर की चौखट लांघे मेरे रहते।😡😡😡
भुवन – तो फिर इस लड़की को परेशान क्यों कर रहे हो आप??
शालिनी- हम क्यों करेंगे परेशान। यह लड़की मेरा सेवा नही करती इसलिये चौराहा का लाग लग गया है।
भुवन- तो आप रोकिये उसको
शालिनी- 😡😡😡कैसे रोकेंगे ये लोग मेरा भोग देगा तब तो।
भुवन- क्या भोग लगता है आपको??
शालिनी- वीर हैं हम काला बकरा का कलेजा और मदिरा का धार लेते हैं😡😡😡💀💀💀

बलराम से रामभुवन ने पुछा कौन हैं ये जो भोग लेते हैं आप लोग क्यों नही देते।
बलराम ने अनभिज्ञता जताई। कहा हमारे पिताजी बस रोज सुंगधित जलधार और गुड चना का भोग देने कहे थे। साल में एक बार ध्वजा पूजन और रोट चूरमा चैत्र में। सालों से यही करते आ रहे हैं।

शालिनी💀😡💀😡 – इसलिये अब मरने का समय आ गया है तुमलोग का। जो मेरा भोग है वो देते नही तो कहां से रक्षा करेंगे हम। 😡😡😡

बलराम- पर संजय जो आये थे वो तो कुछ और ही बता कर गये और उस दिन शालिनी के शरीर पर जो आये थे वो कौन थे फिर?? किसको बांध कर ले गये।

शालिनी- 😡💀 वो पाखंडी कुछ नही ले गया। बल्कि तुम्हारे घर की सुरक्षा तोड़ कर अपना भुत इसके शरीर पर खेला कर अपनी इच्छानुसार बकवाकर फिर खुद ही उसको बांध कर ले गया।
और कोई नही परेशानी है यहां।

बलराम- तो आपके रहते यह सब कैसे हुआ। संजय के आने से पहले ही ना इतना कुछ हुआ तब उसके पास हमलोग गयें। यह खंडहर में क्यों जा कर बेहोश हो रही थी। उल्टा सीधा हरकत क्यों करती थी।

शालिनी- चौराहा का लाग इसका दिमाग पर चढ़ गया था और कुछ नही । हम रोक लेते लेकिन वह मजबुत था इसलिये घर पर हावी हो गया। ऊपर से तुम लोग हमको पूजा देता नही है तो क्या करते।😡💀😡💀

रामभुवन- लेकिन संजय तो इनके पूर्वज लोग से संबंधित कुछ और ही कहानी बताया है। आप कुछ और बोल रहे हैं। कौन सही है।

शालिनी- 😀😀😀😡😡 वो ढोंगी कुछ नही जानता। केवल हवा बना रहा है। कुंवारी लड़की का शरीर देखकर छुने का बहाना बना रहा था। नही चला तो ऊल जुलुल बोलने लगा। अपना ही भूत खेलवाकर अपने बांध कर ले गया। तुम लोग मुर्ख हो😡😡😡😡

बलराम – आप प्रमाणित कीजिये की आप ही हम लोग के रक्षाकारक देवता हैं तब तो हम सबको विश्वास होगा।

शालिनी-😡 तो मत कर ना विश्वास । जा उस तांत्रिक के पास और लुटा पैसा। कल को लड़की लेकर भाग गया तो छुपाते रहना मुंह। एक तांत्रिक तेरी बुआ को ले भागा तो ताउ ने हत्या की अब ये लेकर भागेगा तो तु या तेरा बेटा करना हत्या ।
इस बात की चोट बलराम और उसके परिवार पर सटीक लगी और वे टुट गये तथा रामभुवन पर विश्वास करने लगे।

यहां अनिल और रोहित ने रामभुवन के साथ मिलकर जबरदस्त प्रपंच रचा था। अपने से वचन सिद्ध शक्ति को दुसरे के शरीर पर खेलाना भी एक तंत्र कला है और उससे वही कहलवाना जो साधक चाहे। ऐसी ही विद्या के द्वारा रामभुवन ने पुरा मामला ही पलट दिया। अब संजय ही दोषी साबित हो गया वो भी खुद शालिनी के मुंह से।

रामभुवन ने कहा की मैं तुम्हारा भोग दिलवा रहा हूं तुम इस घर पर सभी की रक्षा करो।
शालिनी-😡 अभी दो तो अभी से रक्षा करूं।

अब सबसे बडा़ घात बलराम के परिवार के साथ हुआ।
जहां मर्कट भैरव का थान था। वहां रामभुवन रोहित और अनिल, बलराम तथा देवराज के साथ गयें।
उस थान को केवडा़ जल और मिट्टी से लिपा गया। फिर वहां अबीर गुलाल से चौकी बनाया। एक मिट्टी का पिंड बनाकर भुवन एक पिशाच को वहां बैठा दिया। काला हांडी में शराब भर कर उसमें कलेजा डलवाकर बलराम और देवराज के अंगुली से रक्त लेकर उसमें डलवाकर चढ़वा दिया। अब अनजाने में ही बलराम का परिवार इस प्रेत शक्ति को भोग पर पुज लिया।
उसके बाद परिवार के हर सदस्य से पान का मीठा बिडा़ राम भुवन ने चढ़वाया। इन सबके बाद करंज तेल का दीपक जलवा दिया। और इस धुर्त ने सभी को रोज वहां दीपक जला पूजा करने बोला। सबको वापस भेज कर उस स्थान पर बिडी़,खैनी चढा़कर 13 अति सुंगधित अगरबत्ति जला दिया और मंत्र से पिशाच को वहां आबद्ध कर दिया। अब उस हद में रहकर उस पिशाच शक्ति को आदेश दिया काम करते रहना था। उसका भोग पुजा स्वतः मिलते रहेगा।
अनिल का चाल पुरा सफल हो गया। शालिनी सामान्य हो गयी कुछ देर में।
अनिल ने कहा अभी एक सप्ताह तक रामभुवन यहीं हमारे यहां हैं तब तक में सारा परेशानी देखकर समेट लिया जायेगा।
अगले दिन से बलराम के घर में सब सामान्य होने लगा। शालिनी स्वस्थ लग रही थी। और घर का माहौल भी बदला बदला लग रहा था।
बलराम तथा देवराज को विश्वास हो गया की संजय की बताई सारी बात मंगढ़त है और जो भी था रामभुवन सब ठीक कर चुका है।
उसदिन शाम को बलराम ने अच्छी खासी रकम रामभुवन को दिया और आगे का सब कार्य सही कर देने को कहा।

उधर संजय को सारी जानकारी प्राप्त होती रही और वह इस छल छमंद कपट के कारण एक परिवार को अपने समक्ष मृत्यु के मुख में जाते हुये देखने को विवश थे।

आगे क्या किया अनिल ने?
ब्रह्मपिशाच का क्या हुआ?
बलराम का परिवार बचा या हुआ बर्बाद

सब जानिये अगले भाग में।

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अगला भाग जल्द ही……