तंत्रोक्त भस्म की यह खासियत होती है की वह जब कीलन करता है तब संबंधित शरीर पर आयी हुई शक्ति प्रेत के अलावा अन्य उपस्थित सभी शक्तियों को कुंठित कर देता है। केवल उच्च कोटी की शक्तियां ही विचरण करने में समर्थ होती है।
वहां उपस्थित प्रेत कीलित पडा़ था। अब समय था उन घटनाओं से आवरणों को हटाने का।
किसी भी प्रेत या पारालौकिक घटना के सत्यता को जांचने और कारण के मूल तक पहुंचने हेतु हर साधक का अपना तरीका होता है। कोई अपने सिद्ध वचनबद्ध शक्तियों के माध्यम से सब कुछ जान लेते हैं फिर उस अनुरूप तंत्र काट करते हैं। कुछ साधक प्रेत शक्ति को पाश विद्या से आबद्ध कर फिर अस्त्र मंत्रों के प्रयोग या देव शक्तियों के द्वारा प्रताडित कर उसके ही मुख से सत्य बुलवाते हैं।
संजय के मंत्र प्रयोग से कीलित शालिनी एक जगह स्थिर हो हुंकार रही थी। परिवार के सभी सदस्य एकटक दृष्टि साधे बैठे थे…
संजय द्वारा तैयारी पूर्ण कर लेने के पश्चात बंधित कलश को विमोचन मंत्रों द्वारा पहले खोला गया फिर कुशा और गोबर का छोटा छोटा 7 आसन बना कर उस पर कलश के सातों पत्तों को रखा गया। रखने के पश्चात कुछ विशेष मंत्रों के उच्चारण और मुद्रा प्रदर्शन के बाद ब्रह्म खुल चुका था और सामने धुंधली आकृति में खडा़ था।
संजय के द्वारा समस्त दिशा बंधित और कुशासन पर स्थान देने के कारण वह कुछ करने में असमर्थ था।
संजय ने पुछा की अब बोलो क्या परेशानी है तुमको और कैसे आये शालिनी के ऊपर
ब्रह्म – तुम्हें अपने विद्या पर बहुत अभिमान है ना तो तुम उसी से जान लो। और यह बंधन बहुत देर तक मुझे रोक नही सकता। इसलिये व्यर्थ का समय बर्बाद कर रहे हो।
संजय ने जलते धूने में अभिमंत्रित राई के कुछ दाने डाले और मंत्र उच्चारण आरंभ किया।
चण्डी के मंत्रों के प्रभाव के समक्ष भीषण से भीषण ब्रह्म भी हथियार डाल जाते हैं। यही यहां हुआ। चण्डी दुर्गा भगवती के मंत्रों का ताप सह नही सका पिशाच और गुहार लगाना शुरु किया।
अब संजय ने राई डालते हुये ही पुछा की बता पहले की किसने भेजा है तुझे और कैसे आया है तु शालिनी के ऊपर फिर छोडुंगा मंत्र जाप, बोलकर पुनः जाप करने लगा संजय।
ब्रह्म ने कहा कि गांव के ही अनिल ने मुझे नमकीन धार और मिठाई के माध्यम से भिजवाया था शालिनी के घर।
होलिका दहन के समय उसकी पत्नी पहुंचाई थी। और बातचीत करते हुये हंसी मजाक में उसी ने अपने हाथ से मिठाई शालिनी के मुंह में ठुंस दिया जिसे खाने के बाद मैं उस पर लग गया। होलिका दहन के बाद अनिल ने चालन किया जिससे मुझे जैसा वचन दिया गया था मैंने किया।
इतना सुनकर संजय ने राई डालना बंद किया।
क्या क्या वचन पर आया है तु यह भी बता दे।
अब यहां ब्रह्म इधर उधर की बात करने लगा। मुख्य वचन बताने से कतराने लगा। संजय ने पुनः हड़काया की वचन बता ताकी इस स्थान से तुझे भी मुक्त करूं।
वरना फिर बंधने को तैयार हो जा।
ब्रह्म ने मुंह नही खोला । केवल हंसता रहा।
संजय ने समय व्यर्थ करना ठीक नही समझा। उसने पुनः विसर्जनी मुद्रा दिखाकर मंत्रों का उच्चारण किया जिससे ब्रह्म पुनः पीपल के पत्तों पर आबद्ध हो गया। उसे फिर से कलश में डाल कर हींगलाज पाश से पुर्णतः बंधित किया तथा पिनाकी मंडल में कलश स्थापित कर दिया। तथा समस्त दिशा विमोचित कर स्थान सामान्य कर दिया। सभी सिद्धियों को पूजित कर पुनः स्थान पर विराजमान कर दिया।
अब रात्रि की प्रतीक्षा आरंभ हुई, बलराम तथा देवराज को सारी बात बताने से पहले वह पुरे मामले को जान लेना चाहता था। उसे पता था की जब पेड़ का तना का पता चल गया है तो जड़ भी वहीं मिलेगा।
रात को संजय पहुंच गया शहर के बाहर रक्षा काली मंदिर।
वहां के पूजारी संजय के मित्र थे तथा दोनों ही तंत्र विद्या में एक दुसरे के सहयोगी थे। रात में आसन लगा आरंभिक क्रियायों को पूर्ण कर अपने सहायक देव सिद्धेश का आवाह्न किया जो एक यक्ष थे। बिंब रूप में उपस्थित सिद्धेश को अर्घ प्रदान कर प्रणाम किया।
तथा उन्हें अनिल के विषय में तथा पूर्ण अभिचार की स्थिति पता कर बताने को कहा।
यक्षदेव सिद्धेश अपने लक्ष्य की ओर चले गये। जब तक वह वापस नही आते तब तक उनके नाम से मधु मिश्रित धतूरे बीज की आहुति कुबेर कुंड में देते रहना था।
कुछ बातें जो आपको जान लेनी चाहिये।
ब्रह्म अगर जीवित अवस्था में स्वयं तंत्र मंत्र का साधक हो, कोई उच्च कोटी का उपासक रहा हो तो वह अपने बंधन को स्वतः काटने खोलने में समर्थ होता है। हर ब्रह्म नही खोल पाते स्वयं को। यह दोनों बात ब्रह्म के अवस्था और साधक की क्षमता पर निर्भर करता है।
यही कारण था की इस ब्रह्म को हर बार नये पाश मंत्रों से बांध रहा था संजय।।
दुसरी बात यक्ष सिद्धी करने के बाद विषम परिस्थिति में ही उनका आवाह्न करना सही रहता है। क्योंकी यक्ष का अर्थ ही है बडा़, भीषण। उनकी ऊर्जा बहुत ही प्रबल रहती है जिसकी निरंतरता आवाह्न के बाद साधक की प्राण ऊर्जा के साथ बनी रहती है। इसी कारण से ऊर्जा क्षरण होने से बचने हेतु यक्ष आवाह्न बिंब रूप में करते हैं तथा कुबेर कुंड में विशेष आहुति भी पड़ रही थी।
अब यह विषय भी उठता है की क्यों यक्ष के द्वारा ही पता लगाना। यह कार्य तो मसान भी कर सकता है, प्रेत – पिशाच भी कर सकता है। तो इसका उत्तर यही है की साधक की अपनी क्षमता और चयन करता है विश्लेषक शक्तियों का। अब जिन यक्ष की सिद्धि यहां की थी संजय ने वह सक्षम थे बहुत से बंधनों को भेदकर सब कुछ पता लगाने में।
अब प्रतिक्षा थी इस प्रपंच के भेद की।
लगभग 15 मिनट के बाद सिद्धेश वापस लौट आये और लाये अपने साथ इस प्रपंच की सारी कथा।
कुबेर कुंड में इलाइची लौंग के 7 जोडे़ समर्पित कर उन्हें आसन प्रदान कर संजय सुनने को एकाग्र हुये।
सिद्धेश ने बताना आरंभ किया।
बलराम के पिता जी 2 भाई थे। बडे़ भाई स्वभाव से गुसैल और लंपट प्रवृत्ति के रहे। धनाढ्य होने के कारण शक्ति थी , लठैत पाल रखे थे। गाय भैस पालने के शौकिन थे। इनकी गायें अगर किसी के खेत में घूस जाये और कोई शिकायत लेकर आ जाये तो उसपर लाठी छोड़ने में देर नही लगाते। इनके दबंग प्रवृत्ति के कारण कोई इनसे भिड़ता भी नही था जल्दी।
इनके घर के पास ही घनश्याम मिश्रा जी का घर था जो काशी से शिक्षा प्राप्त कर लौटे थे और आस पास के गांवों में इनकी विद्वता के कारण बहुत प्रतिष्ठा थी। लक्ष्मी की भी पूर्ण कृपा थी। अपने खेती और जगह जमीन पशु इत्यादि से परिपूर्ण थे। पहले के समय में कुलगुरु हुआ करते थे। घनश्याम मिश्रा जी के पिताजी जितने यजमानों के कुलगुरु थे कालांतर में उन सभी के कुलगुरु घनश्याम जी बने थे। सौम्य साफ हृदय के , सबका भला चाहने वाले पंडित ब्रह्मण थे जो आजकल तो शायद ही मिलें कोई।
बडे़ बडे़ जमींदारों के यहां जितनी भव्यता से पूजन अनुष्ठान करवाते। उतनी ही प्रखर प्रबुद्ध और लगन से गांव के सामान्य जन के यहां भी पूजन करते।
काशी में रहकर इन्होंने ना केवल वैदिक शिक्षा ग्रहण की अपितु मणिकर्णिका की घाट पर अपने गुरु भाई के माध्यम से सात्विक तंत्र सिद्धियां भी अर्जित की थीं जिनका उपयोग यदा कदा वे परेशान गृहस्थों के उपचार हेतु करते थे।
एक बार गांव में रामप्यारे नाम के व्यक्ति जो धनाढ्य परिवार से था,के यहां कोई अनुष्ठान था जिसमें घनश्याम जी के ब्राह्मण मित्र काशी से आये थे। अनुष्ठान समाप्ति पर भोजन के समय जब सभी लोग भोजन कर रहे थे तभी बलराम के बडे़ पिता वहां आये। धन के मद में उन्मत्त उन्होंने किसी भी ब्राह्मण को प्रणाम नही किया। जबकी वहां उपस्थित सभी लोग उन्हें प्रणाम राम राम इत्यादि किये।
पंगत में बैठे ब्राह्मणों की ओर देखकर अपने मित्र को बोलकर कटाक्ष किये की – यही पूजा हो रहा था?? 1 प्रहर का पूजा नही करते 4 मन पेट पूजा करवाईये। दक्षिणा लेंगे मन भर से कम नही। 😁😁 और दोनों हंस पडे़। यह बात बहुत छोटी होकर भी आत्म सम्मान को ठेस पहुंचाने वाली थी। किसी ने कुछ नही कहा।
तभी पंगत में बैठे एक श्याम वर्ण के ब्राह्मण को देखकर फिर बोले -” करिया बामन और गौर चमयिन बहुत खतरनाक होते हैं”
यह सुनकर उन ब्राह्मण देव को बुरा लगा। साथ ही सभी उपस्थित लोग को भी ठेस पहुंचा।
इतने पर भी चुप ना रह कर फिर बोलें ज्यादा पूजा चोर के लक्षण होते हैं। अब यहां तो इ रामप्यारे भी दिन रात घंटी बजाता है और ई बाबा लोग भी घंटी बजाते हैं, अब चोर चोर मौसेरे भाई 😁😁😁😁
इतना सुनकर क्रुद्ध हो एक युवा ब्राह्मण भोज से उठ गये। बाकी लोग घनश्याम जी की सम्मान हेतु और उनकी आदेश की प्रतिक्षा हेतु राह देख रहे थे। रामप्यारे भी तब तक आ चुके थे। और बार बार उन युवा ब्राह्मण को हाथ जोड़ क्षमा याचना करते हुये भोज पूर्ण करने का निवेदन करने लगे।।
बलराम के बडे़ पिता जोर जोर से हंस रहे थे। रामप्यारे ने इनसे भी निवेदन किया की आप कृपया बाहर बैठें। हमारे पूजन के इस भोज को पूरी होने दें।
इतना सुनकर तैश में आकर बलराम के बडे़ पिता हाथ छोड़ दिये रामप्यारे पर। चोट शरीर पर नही बल्कि आत्म सम्मान पर लगी।
गाली बकते हुये वहां से बाहर निकल गये बलराम के बडे़ पिता।
अब बाह्मणों ने भी पंगत छोड़ दी। ऐसी स्थिति में संभव भी नही था। घनश्याम जी उठकर हाथ धो लिये साथ ही सब कोई। रामप्यारे क्षमा मांगते रहे। घनश्याम जी ने कहा आपका कोई दोष नही आप स्वयं को संभालें।
और सभी चले गये।।
उस रात सभी आये हुये ब्राह्मण घनश्याम जी के घर पर रूके थे। वहां रात्रि में इन्हीं सभी बातों पर चर्चा हो रही थी की तभी बलराम के बडे़ पिता के लठैत आ धमके और उन युवा ब्राह्मण को पीटने लगे जो वहां सबसे पहले विरोध किये थे। उनको बचाने के चक्कर में घनश्याम जी भी पीट दिये गये। कोई गांव वाले बचाने नही आये। मार पीट कर लठैत निकल गये। बलराम के बडे़ पिता का कहना था जो लोग हमारे दान दक्षिणा पर पलते हैं वो हमारे सामने आवाज ऊंची ना करें। पूजा पाठ ज्योतिष तंत्र को वह ढोंग ढकोसला और पाखंड के सिवाय कुछ और नही मानते थे। घर पर भी उनके कारण कोई पूजा पाठ नही होता था विशेष।
अगले दिन दवा इलाज करा फिर सभी ब्राह्मण वापस लौट गये। घनश्याम जी घटना से आहत हो कर। अपने घर जमीन को बेच कर गांव छोड़ने की ठानी। यह नौजवान थे और अभी विवाह हुई नही थी। माता पिता थे नही।
गांव के सेठ साहुकार जो इनको बहुत मानते थे उन्होंने बहुत मनाया पर वह ना माने। उन्हीं लोगों ने फिर मुंह मांगी दाम पर सब जगह जमीन घर पशु खरीद लिया। सोने के सिक्कों को बक्सों में भर कर गांव छोड़ने को तैयार हुये घनश्याम जी।
किसी को पता ना चले इसलिये भोर में निकलने का निर्णय लिया। और पहले पहर में घर छोड़ कुछ जरूरी सामानों सहित एक बैलगाडी़ से जो इनका ही था घर से निकल गये।
गांव के बाहर पहुंचते ही बलराम के बडे़ पिता अपने लठैतों के साथ खडे़ मिले। गाडी़ से उठाकर नीचे पटक दिया और पहले मुंह बांध कर हाथ पैर पर लाठी लाठी मारते हुये उसे तोड़ डाले।। फिर उठाकर खंडहर पडे़ पुराने मस्जिद के बीच ले गये। वह मस्जिद इसलिये खंडहर था क्योंकी पूरा बनने से पहले ही हिंदू मुस्लिम दंगा हुआ था जिसमें मुस्लिम गांव छोड़ भाग गये थे। वापस आये नही क्योंकी उस समय संख्या कम थी उनकी। गांव सिवान शहर के नजदीक था इसलिये दंगा प्रभावित क्षेत्र था।
वहां घनश्याम को फेंक दिया गया और तभी एक युवती के मुंह को बांधकर वहां लाया गया, चन्द्रमा की आभा में वह सुंदर सी युवती अत्यंत कमनीय लग रही थी। रोने से जो आंसु बहीं थीं वो स्फटीक के समान उनके चेहरे पर चमक रही थी। उनके हाथ पैर बंधे हुये थे। वहां लाकर उनको भी घनश्याम के पास फेंक दिया गया। दोनों एक दुसरे को इस अवस्था में देखकर फफक फफक कर रो पडे़। उस असहनीय पीडा़ में भी उनके नेत्र एक दुसरे के पीडा़ से ही पीडित हो रहे थे। तभी उस दैत्य के आदेश से लठैतों ने दोनों को मारना आरंभ किया और तब तक मारा जब तक दोनों की एक एक हड्डी टुट ना गयी।
उसी अवस्था में उनके ऊपर लकडी़ की जीवित चित्ता तैयार कर फिर उसे अपने हाथों से हृदय विहिन दैत्य ने आग लगा दी।
हर प्रपंच प्रेम से ही आरंभ होता है। यहां भी था वह। प्रेम चाहे शरीर का हो,चाहे धन का, चाहे पद का हो या हो प्रतिष्ठा का, जब यह प्रेम मर्यादों को उल्लंघित करता है तब यह केवल विनाश का प्रपंच रचता है।
रहस्यों का अनावरण अगले भाग में भी जारी रहेगा। मैं घटनाओं के साथ साथ और भी आवश्यक जानकारियां देता रहता हूं ताकी आप सब इसके कारणों को भी समझते चले। इसलिये हर भाग लंबी हो जाती है परंतु आप सभी की समीक्षायें हमारे लेख के प्रेम को दर्शाती है की आप सभी को आनंद भी आ रहा है और नित्य नवीन जानकारियां भी मिल रही हैं। आप सभी अपना प्रेम इसी प्रकार देते रहें।
धीरे धीरे आग की लपटें तेज हुईं और दोनों शरीर जीवित ही जलकर राख हो गये। दो दिन बाद उन राख को वहीं जमीन खोद कर ढक दिया गया और ऊपर से ईट पत्थर रख दिया गया।
संजय ने यक्ष से पुछा वह युवती कौन थी और बलराम के बडे़ पिता से क्या संबंध था जो ऐसी क्रुरता दिखायी उसने।
यक्ष ने कहना आरंभ किया – युवती का नाम रचना था वह बलराम की बुआ लगती थी। एक पुत्र था और दुसरी बार गर्भवती थी। उसकी पति की मृत्यु परदेश में हो गयी थी किसी अज्ञात बिमारी के कारण।
संजय ने कहा – फिर यहां घनश्याम के साथ?????
रचना और घनश्याम बाल मित्र थे जो समय के उपरांत प्रेमी बन गये। बलराम के बडे़ पिता ने अपनी बहन की शादी जबरदस्ती किसी और से करवा दी। उससे इसका एक पुत्र है। उसके उपरांत ही वह विधवा हूई।
वापस पिहर आने के उपरांत घनश्याम से मिलना जुलना आरंभ हो गया और वह पुनः गर्भ से हो गयी। यह बात गांव में फैलती इससे पहले रचना के घरवालों को पता चल गयी। और बलराम के बडे़ पिता ने क्रोध में आकर सभी को मार डाला।
सारे सोने के सिक्के भी उनके राख के साथ गाड़ दिये गये हैं। अपनी बहन का धोखा सह ना पाने के कारण गर्भवती बहन की हत्या तो कर दी लेकिन उसके बाद इस कुकृत्य को झेल न सके और बलराम के बडे़ पिता को सन्निपात के कारण मृत्यु के मुख में जाना पडा़।
घटना के 11 वर्ष व्यतीत हो चुके थे देवराज का जन्म होने वाला था और बलराम के पिताजी अब बुजुर्ग हो चुके थे।
प्रसव के उपरांत बलराम की पत्नी की तबियत बहुत बिगड़ गयी। और उसी अवस्था में प्रथम बार उसके शरीर पर बलराम की बुआ का आवेश आया। उसने बहुत परेशान किया था। बडे़ बडे़ ओझाओं को उखाड़ फेंकती थी। शरीर पर आने के बाद बलराम की पत्नी को होश नही रहता था। फिर एक साधक द्वारा उसे बांध कर ले जाया गया तथा इनका घर और परिवार को सुरक्षित कर दिया गया था।
बलराम के पिताजी अपने बहन के जीवित पुत्र को प्रेम से पालें तथा गांव में अपने खेत पर छोटा सा घर बना दिये थे। 16 वर्ष का युवा का विवाह कर दिया गया था। वहां अपनी पत्नी के साथ रहता तथा मामा द्वारा दिये गये खेत पर खेती करवाकर अपना गृहस्थ चलाता। इसका नाम ही अनिल था।
🙄🙄🙄संजय को लगभग सारा प्रपंच समझ में आने लगा था। उसने यक्ष से पुछा की आगे का सारा प्रसंग बताईये। उन्होंने बताना आरंभ किया कि जब भी बलराम की पत्नी गर्भवती होती और प्रसव होता तो प्रसव उपरांत जन्म शौच के कारण गृह बंधन टुट जाता और उसकी बुआ शरीर पर आने लगती। फिर किसी से दिखा सुना कर उसे ठीक किया जाता। बुजुर्ग पिता ने स्थाई समाधान हेतु कलकत्ता के कालीघाट से कुछ शाक्त साधकों को बुलवाया।
उन्होंने अपने साधना के शक्ति के सहारे सब कुछ देख सुनकर बताया की चुंकी यह शक्ति अकेली नही है इसलिये यह हमेशा बंधन में नही रहेगी। इसके मुक्ति हेतु गया श्राद्ध और नारायण बलि इत्यादि बद्री धाम में संपन्न करवा दीजिये। तंत्र के द्वारा एक सीमित समय तक और एक अवस्था तक बंधेगी। गलती होने पर यह पुनः ऊपर उठ जायेगी।
गांव वालों में सभी को बुआ की हत्या नही पता थी ना ही किसी को यह पता था की उसके गर्भ में घनश्याम का अंश आ चुका था।
पंडितों और साधकों के अनुसार जो कर्म कांड उनके हत्या स्थल से करना था उससे सभी को जानकारी हो जाती की वहां एक नही तीन हत्या हुयी है।
बुआ को तो बलराम के बडे़ पिता कहीं और भेज दिये हैं यह बोलकर छुपा चुके थे बात। अब कोई यह चाहते नही थे की यह कुकर्म सभी के समक्ष आये। इसी कारण मोक्ष कार्य होने नही दिया। अपितु तंत्र द्वारा दीर्घ रक्षण का विधान चुना गया।
तब तांत्रिकों द्वारा उनके निवास को विशेष तंत्र प्रक्रिया द्वारा बांधा गया। जिसमें पहले शमशानिक लांगूर विद्या का प्रयोग हुआ जिसके अंतर्गत युवा स्वतः मृत मर्कट के कपाल को शमशान में जाग्रत करके सिद्ध किया जाता है। कितने साधक इस साधना को करते समय मृत्यु को प्राप्त हो जाते हैं। कलकत्ता के एक साधक यह सिद्ध किये थे उन्होंने मुंहमांगी धन मिलने पर इस सिद्धि को वहां रक्षण हेतु स्थापित करने का वचन दिया। यह वह समय था जब सोने के थाल में लोग खाते थे और बलराम के पिता पुश्तैनी धनी थे। वह तैयार हो गये। तब मर्कटेश्वर कपाल रक्षण विधान के द्वारा उस गृह के निवासी दीर्घ काल के लिये सुरक्षित किये गये। कपाल को भूमि शोधित कर स्थापित किया गया। तीन दिवस तक विभिन्न तंत्रोक्त सामग्रियों द्वारा जाग्रत कर और पुरे स्थान पर एक निश्चित माप पर एक एक विशेष अभिमंत्रित जाग्रत हड्डी गाडा़ गया। फिर तंत्रोक्त मर्कट रक्षण हवन द्वारा उनके तंरंगों को एक सुत्र में बांध दिया गया। उस बंधन को भेदना अब किसी पैशाचिक शक्ति के वश की बात नही थी।
उसके पश्चात उस स्थान पर जाकर जहां तीनों की हत्या हुयी थी, मणिकर्णिका भैरव के तंत्रोक्त पाश मंत्रों से अभिमंत्रित अष्टधातु निर्मित कीलों से उस स्थान को कील दिया गया साधकों द्वारा। एक हाथ उंचा ईट का चबुतरा बना उसके बीच में अभिमंत्रित जाग्रत स्वर्ण त्रिशूल को स्थापित कर उन तीन पिशाच शक्तियों को आबद्ध कर दिया गया।
इस पूरे कार्य को 5 साधकों ने अंजाम दिया।
पुनः घर के बाहर एक शमी वृक्ष के नीचे चबुतरे पर एक देव स्थान निर्मित कर वहां मर्कट भैरव का प्रतिकात्मक स्वरूप रक्त वर्ण शीला स्थापित कर पूजन बलि विधान इत्यादि बता दिया गया ताकी यह परिवार दीर्घ काल तक सुरक्षित रहे। पानी जैसा पैसा बहा इस पूरे क्रिया कलाप में। इसके पश्चात कोई विशेष विघ्न कभी नही आया।
बलराम के पिता जी जीवन पूर्ण होने पर स्वर्ग वासी हुये एवं उनके पश्चात बलराम ने अपने वंश और व्यापार को सुचारु रूप से चलाना आरंभ किया।
चार संतानों तथा धर्मपत्नी के साथ बलराम हंसी खुशी रह रहे थे।
अनिल जो इनके बुआ का बेटा था उसके भी दो संतान हुये एक पुत्र और एक पुत्री। पुत्री प्रत्युषा तथा पुत्र रोहित।
अनिल को जानकारी थी अपने माता के साथ हुई सारी घटना की। इसे बताना वाले वही ब्राह्मण थे जिनको घनश्याम के घर पर बलराम के बडे़ पिता ने लठैतों से पिटवाया था। सब कुछ जानकर भी अनिल मौके की तलाश में था। द्वेष से भरा लेकिन कभी भी जाहिर नही होने दिया। उपयुक्त समय पर रोहित को उसने सारी बातों से अवगत कर उसे कामरु कामाख्या भेज दिया था तंत्र विद्या में प्रवीणता प्राप्त करने हेतु। और गांव में सभी को कहा की वह दिल्ली में रह कर पढा़ई कर रहा है।
रोहित कामरु कामाख्या में अपने गुरु के द्वारा विभिन्न तंत्र विद्याओं को सीख लगभग 5 वर्ष बाद वापस लौटा था। और वापस आकर वह भी अपने बुजुर्ग पिता के सेवा टहल में लग गया था। अनिल कहता जब तक इस परिवार का वंन समाप्त नही होगा मैं मरूंगा नही। मेरी मां की मृत्यु जैसे हुई है उसका बदला मैं लुंगा जरूर।
यक्ष ने बताया की जिस ब्राह्मण को बलराम के बडे़ पिता के द्वारा मारा गया था वह भी इन सबको मजा चखाना चाहता था और चुंकी वह घनश्याम का मित्र था और साथ में साधनाऐं की थी तो उसे भी विभिन्न विधियां पता थी।
जिस समय कलकत्ता के साधकों द्वारा सभी क्रियायें कि गयी थी उसके बाद सवा मास के भीतर ही उसने पहला अमावस्या को वह स्थान जहां तीनों को जलाकर मारा गया था, जाकर अपने तंत्र विधा के द्वारा सुरक्षा घेरा को कुछ क्षण हेतु कुंठित कर उन तीनों पिशाचों को ऊपर कर रक्त बलि दे पुनः बंधन में भेज दिया।
वहां मृत्त आत्माओं में एक तो खुद घनश्याम था जो तंत्र सिद्ध और वैदिक विद्याओं का ज्ञाता ब्राह्मण था तथा जिसके हाथ पैर पंजर तोड़कर फिर जीवित जलाकर मारा गया था इससे वह अत्यंत क्रोधी ब्रह्मपिशाच बना। दुसरी उसकी विवाहिता प्रेमिका जिसके गर्भ में ब्राह्मण अंश था। वह डाकिनी बनी जो अत्यंत उग्र थी। तथा तिसरा गर्भ का बालक ब्रह्म मसान यानि कलवा बना। यह तीनों अत्यंत घातक थे। इनकी घातकता का अनुमान लगाकर ही कलकत्ते के साधक इतनी उच्चतम् बंधन कीलन और शक्ति स्थापन किये थे।
बंधित ब्रह्म और उसके जोडे़ की शक्ति को कोई भी अनजान साधक खोलकर पूजा बलि देकर वश में नही कर सकता। क्योंकी जो ब्राह्मण यह कर रहा था उसे घनश्याम के सिद्धियों की जानकारी थी उन्हीं को सामने कर तथा उनके ही माध्यम से वह बलि ब्रह्म तक पहुंचाता था। संबंधित साधक की मृत्यु के पश्चात अगर सिद्ध शक्ति किसी को दी नही गयी हो या विसर्जित ना की गयी हो तो वह उस साधक की आत्मा के साथ संबंधित रहती है तथा वचन बंधित होने के कारण दोनों भटकते रहते हैं।
कलकत्ते के साधकों ने ब्रह्म और साथ मरी उसकी प्रेमिका को तो बांध दिये लेकिन वह सिद्ध शक्तियां जो घनश्याम से वचन में थी उन्हें नही रोक सकते थे। क्योंकि उनपर किसी का जोर नही चलता। वह इनके वचन में थी भी नही।
तंत्र का खेल इसलिये ही बहुत टेढा़ होता है। एक एक परत को देखना पड़ता है। एक नींबू से भी बडा़ खेल हो जाता है और कहीं 10 ब्राह्मण भी बैठ कर तिनका नही हिला पाते। अंतर उस गुढ़ विषयक जानकारी की होती है।
रक्त बलि पाकर बंधित तीनों तामस शक्ति बलिष्ठ होती रहीं एवं उन्हें भी प्रतिक्षा थी स्वयं की मुक्ति की।
इधर अनिल का बेटा रोहित जब सब कुछ सीख कर वापस आया तो उन ब्राह्मण ने संबंधित जानकारी इसे देकर और सारा बलि प्रक्रिया समझा कर निपुण कर दिया।
अब आरंभ करना था इस ब्रह्मपिशाच प्रपंच को।
कैसे हुआ आरंभ यह सब??
कैसे मर्कट भैरव को रोका रोहित ने??
स्वर्ण त्रिशूल को हटाने के लिये क्या किया और फिर कैसे कामयाब हुआ अपनी चाल में????
संजय क्या कर पाया इन सबके लिये ??
जानिये बहुत से अनावृत्त आवरणों को अगले भाग मे।
यह सत्य तंत्र घटना का प्रकाशन गृहस्थ तंत्र के द्वारा रूद्रांश जी कर रहे हैं,किसी भी प्रकार से इन घटनाओं को बिना लिखित आदेश यहां से कॉपी करके कहीं और कोई प्रकाशित करेगा तो उन पर कानुनी कारवाई की जा सकती है।
आप युट्युब पर गृहस्थ तंत्र तथा सिद्ध शाबरी विद्या सर्च करें और इन दोनों चैनल पर जाकर ऐसी बहुत सी विषयों पर रोचक जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।
अगला भाग जल्द ही…….
आप सबका शुभ आकांक्षी
रूद्रांश