तंत्रोक्त भस्म की यह खासियत होती है की वह जब कीलन करता है तब संबंधित शरीर पर आयी हुई शक्ति प्रेत के अलावा अन्य उपस्थित सभी शक्तियों को कुंठित कर देता है। केवल उच्च कोटी की शक्तियां ही विचरण करने में समर्थ होती है।
वहां उपस्थित प्रेत कीलित पडा़ था। अब समय था उन घटनाओं से आवरणों को हटाने का।
किसी भी प्रेत या पारालौकिक घटना के सत्यता को जांचने और कारण के मूल तक पहुंचने हेतु हर साधक का अपना तरीका होता है। कोई अपने सिद्ध वचनबद्ध शक्तियों के माध्यम से सब कुछ जान लेते हैं फिर उस अनुरूप तंत्र काट करते हैं। कुछ साधक प्रेत शक्ति को पाश विद्या से आबद्ध कर फिर अस्त्र मंत्रों के प्रयोग या देव शक्तियों के द्वारा प्रताडित कर उसके ही मुख से सत्य बुलवाते हैं।
संजय के मंत्र प्रयोग से कीलित शालिनी एक जगह स्थिर हो हुंकार रही थी। परिवार के सभी सदस्य एकटक दृष्टि साधे बैठे थे की अब क्या होगा।
संजय ने हाथ में अभिमंत्रित राई लेकर उसे झटके से शालिनी पर मारा। शालिनी एकदम से ऐसी चीखी जैसे उसे किसी ने मारा हो।
बोल की ऐसे ही लात खाते रहेगा रे। थेथर है क्या जी?? बक की कौन है और कैसे आया है इस लड़की के ऊपर??
एक कुटील मुस्कान के साथ झुमना आरंभ की शालिनी जैसे चुनौती दे रही हो की बुलवा लो अगर दम हो तो।
संजय बिना देर किये अपने अघोर दंड के द्वारा जलता कपूर उठा कर शालिनी के सामने रख दिया और उसमें शालिनी के बाल झटके से उखाड़ कर जला डाले।
शालिनी पर आया पिशाच इसके लिये तैयार ना था। वह रो उठा और हाथ जोड़ कर सिसकने लगा।
वास्तव में जब सिद्ध दंड का प्रयोग होता है तो बंधन टुट जाता है। क्योंकी दंड मुख्यतः गुरु परंपरा से प्राप्त होता है।
कपाल दंड, श्यामा दंड, रूद्र दंड, पिशाच दंड, मसान दंड इत्यादि पंथ अनुसार इसके भेद होते हैं। सबकी अलग क्षमता और कार्य प्रणाली होती है।
कीकर वृक्ष का ऐसा तना जिस पर तीन शाखा एक साथ हो उसे कृत्तिका नक्षत्र रविवार के दिन जब पडे़ तब लाकर मुंडमालिनी मंत्र द्वारा जागृत किया जाता है। 5 अलग अलग धातु के कीलों को पंचमुखी शिवजी के तंत्रोक्त मंत्रों द्वारा अभिमंत्रित कर चैतन्य करने के उपरांत लगाया जाता है। तत्पश्चात तीन विशेष बलि होती है अलग अलग स्थानों पर। खप्पर भरा जाता है। जिस दंड के साथ खप्पर भर दिया जायेगा,वह दंड कभी भी गृहस्थ के चौखट को नही लांघेगी , यह अघोर की मर्यादा है। विशेष परिस्थिति में ले जाने के समय उसे पीडित व्यक्ति के ग्रामदेवता/क्षेत्रपाल/नगरदेवता के चौखट पर पहले लेजाकर कुछ तंत्रोक्त क्रियायें संपन्न की जाती हैं फिर उसमें लगें कीलों में से दो किल उस देवता के चौखट पर निकाल कर दोनों ओर रख देते हैं। (मंत्र, धातु, और कौन से कील निकाले जाते हैं, यह सब मर्यादा रखने हेतु यहां नही बताया जा रहा)
तत्पश्चात गृहस्थ के चौखट को साधक दंड धारण किये या पास रखकर वाम पाद से लांघता है।
संजय ने शहर में आते ही इन प्रक्रियाओं को पूर्ण कर लिया था। क्योंकी अपने देवों के द्वारा वह जान चुका था की जिससे भिड़ने जा रहा है वह सामान्य शक्ति नही।
दंड प्रयोग से विवश हुआ वह पिशाच प्रथम बार बोलने को अग्रसर हुआ और लगभग कराहते हुये बोला- क्या जानना चाहते हो??
संजय – अपना परिचय दो!
शालिनी- कैसा परिचय चाहिये और क्या करोगे जानकर।
संजय- जितना पूछा उतना बोलो!
शालिनी- ब्रह्म हैं हम😡
संजय – कौन से ब्रह्म?? कहां के हो और इसके ऊपर कैसे आये??
शालिनी- नही बतायेंगे रे(चिल्लाते हुये)
अपना नौकर समझ के रखा है क्या, आया है तब से लात मार रहा है। बहुत मंत्र बल दिखा रहा है तुम।
संजय – देख चुपचाप बता जो पुछ रहे हैं।
शालिनी – अट्टहास करते हंसते हुये – अरे पहले ये तो तु बता तेरा तेली मसान कहां है अभी। कल भेजा था वापस नही गया तेरे पास ना। 🤣🤣🤣🤣🤣 और जोर जोर से हंस पडा।
संजय के माथे पर पसीने आ गये।
शालिनी – तुझे क्या लगा तु मुझे बांध लेगा। अरे चल निकल । तेरे जैसे छतीस अघोरी रोज खेलाता हूं मैं। तु यहां आया नही है रे लाया गया है 😡😡😡🤣🤣🤣
अब तो संजय के साथ साथ घरवाले भी ठीठक गये। यह मामला जो भी सुलझाने आ रहा है उसके ऊपर यह शक्ति भारी पड़ रही है। 4 तो ऐसे ही लौट गये। संजय तैयारी के साथ आया लेकिन वह भी घिर चुका था ब्रह्मपिशाच के प्रपंच में। मामला पकड़ में आ ही नही रहा था। निराशा के बादल उमड़ पडे़।
संजय ने आवाहित देवता के मंडल में पंच कपूर प्रज्जवलित की और फिर सभी को एक कमरे में जाने बोला। कमरे को अभिमंत्रित राई और भस्म से कीलित कर सुरक्षित किया तथा केवल देवराज को लेकर घर के बाहर गया। इधर शालिनी पिशाच के उग्रता सह ना पाने के वजह से बेसुध पड़ गयी।
घर से बाहर जाकर संजय ने मुख्य द्वार के पास धार दिया और अपने एक अघोर सेवडा़ का आवाहन किया।
देवराज को कहा की तुम अभी जाकर पीपल के 7 पत्ते लाओ। और वापस आकर गाडी़ तैयार करो मुझे अभी ही वापस जाना होगा। यह बोलकर संजय ने सेवडे़ को देवराज के साथ जाने का आदेश दिया।
इधर संजय ने शक्ति अजमाईस कर परख लिया था की यह चीज क्या है। वहां सभी को लग रहा था कि वास्तव में संजय के पास कोई रास्ता नही बचा है। लेकिन संजय की आंखों में अलग ही चमक थी। वह मन ही मन कुछ विशेष तैयारी कर चुका था। जो सोचकर वह आया था वह भुल कर चल पडा़ किसी और राह पर।
जहां शालिनी बेसुध पडी़ हुई थी वहां पहुंच कर उसने मंडल के रक्षकों को विसर्जित किया तथा मंडल भंग कर डाला। बंधन किये गये शालिनी को मुक्त किया तथा दंड को धार देकर शांत किया।
गंगाजल और तुलसी लेकर कुछ मंत्र बुदबुदाते हुये संजय ने शालिनी पर छिड़का। वह उठ बैठी।
तब तक देवराज पत्ते लेकर आ गया। शालिनी को सामान्य होकर बैठे देख थोडा़ आश्चर्य हुआ उसे पर वह चुप रहा।
संजय ने पत्ते लिये और उसे गंगाजल से धोकर उसपर गोरोचन से अलग अलग सात चिन्ह बनाये फिर सप्तश्रृंगी दुर्गा के सात अलग अलग मंत्रों से उसको अभिमंत्रित किया।
वास्तव में यह तंत्र का एक आकर्षण प्रयोग था। पर यह सामान्य आकर्षण नही बल्कि बंधन हेतु किये जाने वाला प्रयोग था।
एक मिट्टी के कलश को धोकर उसमें पवित्र अष्टगंध चंदन लकडी़ इत्यादि डालकर फिर एक जनेऊ डाला गया संजय के द्वारा और फिर पीपल के सातों पत्तों को एक एक कर फट्कार युक्त मंत्र के साथ शालिनी के शीश पर लगाकर कलश में डालने लगा। अंतिम पत्ता डालने के साथ ही ब्रह्म पिशाच कलश में आबद्ध हो चुका था और शालिनी का शरीर पिशाच के प्रभाव से मुक्त हालांकि पैशाचिक अंश का प्रभाव अभी रहने वाला था।
संजय ने ढक्कन लगाकर उसपर सफेद कपडे़ से कसकर बांध दिया। पुनः अभिमंत्रित रक्षासुत्र से 11 बार लपेटकर उसे पुरा कीलित कर सुरक्षित किया।
अब संजन ने पहले गोबर के कंडे सुलगाकर विशेष द्रव्यों को धूपित करके पुरे घर को गोरख कील के द्वारा बांध दिया। तथा सभी सदस्यों को रक्षासुत्र द्वारा रक्षित कर उसी समय देवराज और उसके साथी सहित अपने स्थान की ओर प्रस्थान कर गया।
जाते जाते शालिनी के हेतु यह कह गया की इसे जितना ज्यादा हो नमक चीनी का घोल पिलाओ। और सुबह सवेरे स्नान इत्यादि के पश्चात यह कवच धारण करवा देना सब।
मैं तीन दिन बाद पुनः वापस आऊंगा तब इस समस्या के वास्तविक जड़ तक चलेंगे।
अभी तक यह मामला किसी के भी समझ में नही आ रहा था। केवल यही पकड़ में आया था कि ब्रह्मपिशाच का प्रभाव है बस।
यह घटनाक्रम जैसे जैसे घटित हुई है ठीक उसी क्रम में मैं आप प्यारे पाठकों के हेतु लिख रहा हूं ताकी आप सब इस घटना के पात्रों की वास्तविक स्थिति का अनुभव लेते चलें।
जब कोई भी नकारात्मक शक्ति किसी के शरीर पर आ जाती है तो उससे प्रभावित व्यक्ति की प्राण ऊर्जा को वह ग्रहण करने लगती है जिसके कारण पीडित शरीर में विभिन्न परेशानियां उत्पन्न हो जाते हैं। शालिनी लगभग दो महीने से इस पीडा़ से गुजर रही थी। अब उसके शरीर में जान लगभग अंश मात्र बचा था। शरीर का रक्त सुख चुका था। आखों में रक्त की कमी साफ दिखती थी।
संजय के तीव्र प्रयोगों की मार शालिनी के शरीर को भी अत्यंत प्रभावित करती जिसके कारण कुछ अनहोनी घटीत हो सकती थी, इसी कारण संजय ने इसके शरीर पर जोर जबरदस्ती करना उचित ना समझा। उसने सप्तश्रृंगी विद्या के अचूक प्रयोग द्वारा बांध कर ब्रह्म पिशाच को अपने तंत्र साधना स्थली पर ले जाने का निर्णय लिया। और सोचा की वहा इस पिशाच की शक्ति भी कम होगी तथा तथ्य भी जल्द पता चलेंगे।
जाने से पहले शालिनी को उसकी मां के साथ अगले ही दिन घर वापस लौट जाने को निर्देशित किया और कहा की इस समस्या का निराकरण आपके ही घर से होगा इसलिये कल ही लौट जायें सीवान।
रात्रि के 3 बजे स्थान पर पहुंच कर उसने देवराज और उसके मित्र को विदा किया तथा स्वयं अपने साधना स्थली में प्रवेश कर कलश को एक ओर सुरक्षित रख दिया।
अब करना था अगले दिन उस पिशाच को अपने तंत्र विद्या से सदैव के लिये बंधित या सब कुछ जानकर पलटना था शत्रु के अभिचार को।
मुक्ति हेतु कार्य करना होगा, थान स्थान देकर पूजवाना होगा या फिर तंत्र पलट कर पुनः बंधन, यह सब विचार संजय के मस्तिष्क में तेजी से घुम रहे थे।
जानिये अगले भाग में की कैसे और क्या किया संजय ने ब्रह्म के साथ। शालिनी ठीक हुई या कुछ हुआ उसके साथ।
प्रिय पाठकों यह कथा सत्य घटना पर आधारित है। पहचान छुपाने हेतु पात्रों के नाम पूर्णतया बदले गये हैं। इसमें विशेष शब्दों की उपस्थिति कथा की रोचकता बनाने हेतु सम्मिलित किये गये हैं। अगर फिर भी इस कथा से संबंधित कोई घटना, स्थान या पात्र किसी से संबंधित पाये जाते हैं तो यह मात्र एक संयोग होगा।
प्रातः 6 बजे तक पूर्ण तैयारी करने के बाद संजय ने तंत्रोक्त स्थान पर बंधित कलश को रखा ।
पहले आसन,शरीर और दिशा को शक्तिशाली मंत्रों से बंधित किया। फिर जयादुर्गा वज्रपंजर मंत्र द्वारा स्वयं के समस्त प्राप्त सिद्धियों को सुरक्षित किया।
प्रश्न उठता है सिद्धियों की सुरक्षा क्यों ??
क्योंकी उसने जिसे बांध लाया था वह कोई साधारण प्रेत पिशाच नही बल्कि ब्रह्मपिशाच था।
बह्मपिशाच कौन होते हैं ?
ब्रह्मदेव कौन होते हैं आइये पहले इन्हें जान लेते हैं। जब आप इनकी शक्तियों से अवगत होंगे तभी इस सत्य घटना के आगे की क्रियायों को समझ सकेंगे।
यह तो सत्य है वास्तविक जीवन के अनुभव, अध्य्यन किये गये शास्त्रों से अलग होते हैं। हम अध्य्यन से यह तो जान सकते हैं कि ब्रह्मराक्षस की श्रेणी का पिशाच क्या होता है, कैसे बनता है और उसकी क्या क्षमतायें होतीं है पर जब वास्तविक जीवन में इस श्रेणी की शक्तियों से पाला पड़ जाता है तो अच्छे अच्छे तांत्रिकों को यह धुल चटा देता है।
प्रत्येक साधक के जीवन में इस प्रकार के शक्तियों से कारण अकारण सामना हो ही जाता है।
ब्रह्मपिशाच बनता कौन है
क्या अकाल मृत्यु वाले हर ब्राह्मण इस श्रेणी में चले जाते हैं? तो इसका उत्तर हाँ है। बस उनकी शक्ति, क्षमता और स्वभाव उन्हे भिन्न बनाता है।
सात्विक और तामसिक यह दो श्रेणी तो प्रमुखतः मान कर चलिये। जीवन काल में जो ब्राह्मण तंत्र क्षेत्र में सिद्धियाँ प्राप्त करने के लिये जीव बलि इत्यादि देता है और तामसिक शक्तियों को सिद्ध करता है, तथा तंत्र प्रयोग या दुर्घटना में अथवा किसी भी कारण उसकी अकाल मृत्यु हो जाती है तो वह तमस रूप को धारण करने वाला ब्रह्म पिशाच की गति को प्राप्त होता है। उसकी सिद्धियाँ और शक्तियां उसके साथ चलती हैं। उदाहरण के लिये अगर जीवन रहते उस साधक ने #मसान, #वीर #प्रेत इत्यादि सिद्ध करके उनका प्रयोग किया था तो अब वह शक्तियां अभी भी इसके वश में रहेंगी।
भगतवाल में इस शक्ति को सिद्ध करना हर कोई चाहता है क्योंकि इसकी शक्ति सबसे अधिक होने के साथ साथ यह कई रहस्यमयी विद्यायों का ज्ञान भी रखता है। ब्रह्म पाश जो सिद्ध कर लेता है उसके लिये तंत्र क्षेत्र एक नया आयाम ही दे देता है। परंतु जिस भगत ने भी इसकी सिद्धि की वह सुखी नही रहेगा और यह भी निश्चित है की उसके वंश का नाश होना ही है। इसलिये अघोर मार्ग और आजीवन अविवाहित रहने वाले साधक तथा परिवार त्याग कर जनकल्याण करने वाले भगत,साधक इसकी सिद्धि प्रमुखता से करते हैं। तमस रूप का पिशाच कभी भी सीधे सिद्ध न करके #महाकाल के नीचे सिद्ध किया जाता है जिससे भगत पर कभी खतरा न बने। अब अगर किसी ने स्वतंत्र रूप से इसे सिद्ध किया है तो उसकी जीवन इससे बंध कर रह जाती है। वह नियमित भोग और सेवा चाहने वाला और वचन के प्रति अत्यधिक निष्ठावान रहता है। परंतु तमस रूप के कारण यह क्रोधी और स्वेच्छानुसार अपने इच्छा से वचन पुर्ति के कार्य करता है।
चण्डी या बडी़ भवानी के नीचे जब यह शक्ति सिद्ध होता है तब यह उनकी हर बात मानता है। ऐसा जीवट साधक श्रम से ऐसी प्रचंड शक्ति को भवानी के बंधन में रखने में सक्षम होता है पर उसमें भी नियम से सेवा पुजा भोग बलि सब देना पड़ता है।
ब्रह्मदेवता
जितनी सात्विकता से अपने जीवन में पुजन,जप, अनुष्ठान, पुरश्चरण, होम, तप करते हैं, शरीर छोड़ने के पश्चात वह अपने जीवन के पुण्यों के अनुसार #देव शरीर धारण करते हैं। इनकी शक्ति असीमित होती है। #उपदेवों की श्रेणी में आने वाले यह देवता ब्रह्मदेव कहलाते हैं।
चुंकी प्रमुखता से यह महाशक्तियों के उपासक, साधक होते हैं इसलिये इनमें क्षमता भी देवों समान ही होता है। सबसे तीव्र फल देने में सामर्थय रखते हैं और अपने आराध्य की साधना, उपासना, पुजा करने वाले भक्तों पर भी कृपा करते हैं तथा शीघ्र प्रसन्न हो जाते हैं।
यह जनकल्याण करने वाले शक्ति अपने अधीन क्षेत्र के समस्त भुतों प्रेतों और वायव्य शक्तियों को रखते हैं।
आप बिहार और उत्तर प्रदेश में ऐसे कितनी ही ब्रह्मशक्तियों ब्रह्मदेवताओं के मंदिर देख सकेंगे।बिहार में भभुआ के हरसु ब्रह्म बाबा और मैरवां के हरिराम ब्रहा बाबा सबसे बडे़ ब्रह्मशक्ति हैं जिनके प्रभाव और शक्ति के समक्ष दुसरे सभी भुत प्रेत और ब्रह्मशक्ति अपनी हठ छोड़ कर स्थान ले लेते हैं। पर उसमें भी बहुत ही खेल है। वास्तव में तंत्र विद्या को एक खेल और भगत को खिलाडी़ इसलिये ही कहते हैं क्योंकी इसमें भी प्रेत शक्तियाँ अपने इच्छापुर्ति के लिये कितने ही छल छमंद करते हैं। भगत और इन ब्रह्मस्थान के सेवक जिन्हें अच्छी जानकारी होती है वही इन ब्रह्म शक्तियों को मनाकर शांत करते हैं।
वैसे तो इन शक्तियों का पार इतना आसान नही क्योंकि इनपर वश चलाना कोई खेल नही। और वास्तविकता यही है की इनपर शक्ति प्रयोग न करके मान मनौवल के द्वारा महाशक्तियों के नीचे थान स्थान दे देना चाहिये। स्वतंत्र रूप से देवब्रह्म को स्थान दे भी देते हैं भगत लोग परंतु एक अनुभवी भगत कभी भी तमस रूप के ब्रह्मपिशाच को कभी भी स्वतंत्र स्थान नही देता।
कैसे लग जाते हैं ? और
कैसे विनाश को रचते हैं ?
मनुष्य का जीवन इस कलिकाल में मिला है तो उसका लक्ष्य भी स्पष्ट रखना चाहिये। पार्वती गीता में जगदंबा ने राजा हिमवान से कहा है कि जब आत्म अपने माता के गर्भ में जाती है तब वह बार बार स्वयं से यह कहती है की मैंने अनेकों जन्म लेकर उसे व्यर्थ के सांसारिक मोह में लिप्त होकर नष्ट कर दिया। यह जन्म मैं व्यर्थ नही जाने दुंगा और पुरे जीवन जगदंबा की भक्ति कर इस संसार बंधन से छुटकारा पा लुंगा। परंतु गर्भ से बाहर आते ही वैष्णवी माया के प्रभाव से वह सब कुछ भुल जाता है।
और अपना सारा जीवन सांसारिकता में ही बिता देता है।
जीवन में सभी कार्यों के साथ भक्ति भी करने की लालसा रखनी चाहिये। महाशक्तियों की भक्ति और साधना उपासना ही इस कर्म बंधन से छुटकारा दिला सकती है।
कर्मों का भोग ही प्रारब्ध है। और इस जन्म या पुर्व जन्म के दुष्कार्य ही वर्तमान में इस ब्रह्मपिशाच के लगने का कारण बनते हैं। ऐसे ऐसे परिवार देखे हैं जिनके 5 पुश्त पहले किसी ने किसी लालचवश साधक ब्राहम्ण की हत्या कर दी और वह ब्रह्मपिशाच रूप धर आज भी उनके वंशजो का रक्त पान कर रहा है। आज उनके वंशज कहते हैं- हमारा क्या अपराध जो यह दण्ड हम भोग रहे हैं लेकिन पीछे का सत्य यही है कि इस शरीर में जो आत्मा है उसने अवश्य ऐसे कुकृत्य किये हैं जिसके कारण इस समय ऐसे परिवार में जन्म लेकर ब्रह्महत्या का दंड पा रहा है और विनिष्ट हो रहा है।
इस जन्म से लेकर पुर्व जन्मों में गौहत्या, ब्राह्मण हत्या, गौ वंश हत्या, किसी बच्चे को भुख इत्यादि से पीडा़ पहुंचाना, देवस्थल को तोड़ना, देव प्रतिमा को छिन्न भिन्न करना, भाई,बहन या भाई के पुत्रों का धन संपत्ति हरण कर लेना, ब्राह्मण की संपत्ति पर बलात् अधिकार कर लेना इत्यादि कारण हैं जिससे #ब्रह्मकोप भोगना पड़ रहा होता है।
मैंने और आपने भी ऐसे ऐसे सज्जन व्यक्तियों को देखा होगा जो सदैव धर्म मार्ग पर हैं, पुजा पाठ होम हवन करते रहते हैं फिर भी इस ब्रह्मदोष से ग्रसित ही हैं। इसका कारण उनकी अपराध की तीव्रता होती है।
आपने यह भी देखा होगा की साधारण व्यक्ति जब साधना में उतरता है तब बहुतों के साथ परेशानियां खडी़ होने लगती है। जहाँ धुप दीप जलाकर वह सुखी था परंतु किसी देव देवी की साधना पुरश्चरण पकड़ते ही उसके साथ एक से एक विकट स्थिति खडी़ होती गयी। कहीं धन नाश, तो कही शत्रु उदय तो कही आकास्मिक दुर्घटना। इसके दो कारण बनते हैं इन शक्तियों के प्रभाव का। यह शक्ति जब तंत्र अभिचार या दोष में लगती है तो कभी भी तुरंत अपना प्रभाव नही दिखाती। वह क्षण भर में ही अपना असर नही दिखा कर धीरे धीरे पुण्यों को क्षय कर, मस्तिष्क पर ऐसा असर करती है की आपसे अपराध हो और आप धर्म पुजा साधना से दुरी बनाना आरंभ करें। कभी कभी तो ऐसे भाव मन में उत्पन्न कर देतीं हैं यह शक्तियां की धर्म मार्ग पर चलने वाला व्यक्ति पीढी़यों से चली आ रहे पुजा पाठ को अभिमान वश ढोंग बोल कर बंद कर देते हैं और कहना आरंभ करते हैं कि ईश्वर हृदय में हैं और मन से स्मरण करो वही पुजा है उनका। ऐसे में धीरे धीरे कुलशक्तियों का सामर्थय घटता है और व्यक्ति के सम्हलने तक कवच टुट चुका होता है तथा यह पिशाच शक्ति अपना प्रभुत्व स्थापित कर कुल पितर, कुल शक्तियों के छोडे़ गये स्थान को ले लेती हैं। अब जब इनसे पीडित व्यक्ति की आंख खुलती है की मेरी परिस्थिति क्यों खराब हो रही है तब वह जानकार, भगत, शोखा, ओझा, तांत्रिक पंडित के चक्कर लगाना आरंभ करता है। और फिर धन लुटाते और संपति गंवाते रहता है। कारण यह है कि एक बार जब मुल से कुलशक्ति हट जाये और ब्रह्मपिशाच जैसी शक्तियां स्थान ले ले तो व्यक्ति द्वारा अपने कुलशक्ति को दिया गया भोग पुजन भी ब्रह्मशक्ति लेने लगती है। और है तो वह स्वभाव से राक्षस तथा तंत्र अभिचार में अगर वचन बलि पर चली है तो वह नाश ही करेगी। अर्थात आपका खा कर आपका ही विनाश। अब ऐसी ही स्थिति को प्राप्त हुआ व्यक्ति कहता है मैं इतना पुजा पाठ करता हुं वह कहां जाता है ? किसी में शक्ति सामर्थय नही होता सब छल है इत्यादि। अब ऐसे व्यक्ति को संभालना सच में दुष्कर होता है। क्योंकि पास आया व्यक्ति का विश्वास इतना क्षीण हो चुका होता है की वह साधक की बातों पर संदेह करता है, चाहे साधक कितना भी सत्य मार्ग का हो और हृदय से चाहे की इन सबका निवारण कर दे फिर भी यह कार्य कठीन होता है क्योंकि प्रभावित व्यक्ति का मस्तिष्क कहीं न कही पिशाच के द्वारा नियंत्रित रहता है। जितनी पुरानी बाधा उतना ही तीव्र नियंत्रण।
यहाँ उन लोगों को उत्तर मिल गया होगा जो यह कहते हैं तथा जो यह नही समझ पाते की पुजा व्रत अनुष्ठान आखिर जा कहां रहा है और जितने प्रबल पुजन हो रहे हैं उतने ही बाधा का स्तर भी बढ़ते जा रहा है।
भगवान ने अपना विधान बनाया है और उससे कोई पार नही पा सकता। जो आज यह कहता है की इतने निष्ठुर क्यों हो आप दयानिधे, तो यह निष्ठुरता ऐसे ही नही वरन हमारे कर्मों का फल है जिसमें वह परम सत्ता भी सम्मलित हैं। जो ब्रह्मपिशाच की योनि में गया है उसका भी कारण होगा और जो उसके कोप को भुगत रहा उसका भी कारण होगा। अब ऐसा भी नही है की इन परिस्थितियों में मनुष्य हार मान कर इसे ही अपना भाग्य मान ले और शोषित होते रहे। जो होना था वह तो हो चुका है परंतु भविष्य के लिये चैतन्य हो इन सबके मुक्ति का मार्ग ढुंढना चाहिये। हाँलाकि यह मैं यहा लिख तो दिया हुं परंतु धरातल पर यह कितना कठिन और कष्टप्रद है इससे पुर्णतः अभिज्ञ हुं।
तंत्रोक्त भस्म की यह खासियत होती है की वह जब कीलन करता है तब संबंधित शरीर पर आयी हुई शक्ति प्रेत के अलावा अन्य उपस्थित सभी शक्तियों को कुंठित कर देता है। केवल उच्च कोटी की शक्तियां ही विचरण करने में समर्थ होती है।
वहां उपस्थित प्रेत कीलित पडा़ था। अब समय था उन घटनाओं से आवरणों को हटाने का।
किसी भी प्रेत या पारालौकिक घटना के सत्यता को जांचने और कारण के मूल तक पहुंचने हेतु हर साधक का अपना तरीका होता है। कोई अपने सिद्ध वचनबद्ध शक्तियों के माध्यम से सब कुछ जान लेते हैं फिर उस अनुरूप तंत्र काट करते हैं। कुछ साधक प्रेत शक्ति को पाश विद्या से आबद्ध कर फिर अस्त्र मंत्रों के प्रयोग या देव शक्तियों के द्वारा प्रताडित कर उसके ही मुख से सत्य बुलवाते हैं।
संजय के मंत्र प्रयोग से कीलित शालिनी एक जगह स्थिर हो हुंकार रही थी। परिवार के सभी सदस्य एकटक दृष्टि साधे बैठे थे की अब क्या होगा।
संजय ने हाथ में अभिमंत्रित राई लेकर उसे झटके से शालिनी पर मारा। शालिनी एकदम से ऐसी चीखी जैसे उसे किसी ने मारा हो।
बोल की ऐसे ही लात खाते रहेगा रे। थेथर है क्या जी?? बक की कौन है और कैसे आया है इस लड़की के ऊपर??
एक कुटील मुस्कान के साथ झुमना आरंभ की शालिनी जैसे चुनौती दे रही हो की बुलवा लो अगर दम हो तो।
संजय बिना देर किये अपने अघोर दंड के द्वारा जलता कपूर उठा कर शालिनी के सामने रख दिया और उसमें शालिनी के बाल झटके से उखाड़ कर जला डाले।
शालिनी पर आया पिशाच इसके लिये तैयार ना था। वह रो उठा और हाथ जोड़ कर सिसकने लगा।
वास्तव में जब सिद्ध दंड का प्रयोग होता है तो बंधन टुट जाता है। क्योंकी दंड मुख्यतः गुरु परंपरा से प्राप्त होता है।
कपाल दंड, श्यामा दंड, रूद्र दंड, पिशाच दंड, मसान दंड इत्यादि पंथ अनुसार इसके भेद होते हैं। सबकी अलग क्षमता और कार्य प्रणाली होती है।
कीकर वृक्ष का ऐसा तना जिस पर तीन शाखा एक साथ हो उसे कृत्तिका नक्षत्र रविवार के दिन जब पडे़ तब लाकर मुंडमालिनी मंत्र द्वारा जागृत किया जाता है। 5 अलग अलग धातु के कीलों को पंचमुखी शिवजी के तंत्रोक्त मंत्रों द्वारा अभिमंत्रित कर चैतन्य करने के उपरांत लगाया जाता है। तत्पश्चात तीन विशेष बलि होती है अलग अलग स्थानों पर। खप्पर भरा जाता है। जिस दंड के साथ खप्पर भर दिया जायेगा,वह दंड कभी भी गृहस्थ के चौखट को नही लांघेगी , यह अघोर की मर्यादा है। विशेष परिस्थिति में ले जाने के समय उसे पीडित व्यक्ति के ग्रामदेवता/क्षेत्रपाल/नगरदेवता के चौखट पर पहले लेजाकर कुछ तंत्रोक्त क्रियायें संपन्न की जाती हैं फिर उसमें लगें कीलों में से दो किल उस देवता के चौखट पर निकाल कर दोनों ओर रख देते हैं। (मंत्र, धातु, और कौन से कील निकाले जाते हैं, यह सब मर्यादा रखने हेतु यहां नही बताया जा रहा)
तत्पश्चात गृहस्थ के चौखट को साधक दंड धारण किये या पास रखकर वाम पाद से लांघता है।
संजय ने शहर में आते ही इन प्रक्रियाओं को पूर्ण कर लिया था। क्योंकी अपने देवों के द्वारा वह जान चुका था की जिससे भिड़ने जा रहा है वह सामान्य शक्ति नही।
दंड प्रयोग से विवश हुआ वह पिशाच प्रथम बार बोलने को अग्रसर हुआ और लगभग कराहते हुये बोला- क्या जानना चाहते हो??
संजय – अपना परिचय दो!
शालिनी- कैसा परिचय चाहिये और क्या करोगे जानकर।
संजय- जितना पूछा उतना बोलो!
शालिनी- ब्रह्म हैं हम😡
संजय – कौन से ब्रह्म?? कहां के हो और इसके ऊपर कैसे आये??
शालिनी- नही बतायेंगे रे(चिल्लाते हुये)
अपना नौकर समझ के रखा है क्या, आया है तब से लात मार रहा है। बहुत मंत्र बल दिखा रहा है तुम।
संजय – देख चुपचाप बता जो पुछ रहे हैं।
शालिनी – अट्टहास करते हंसते हुये – अरे पहले ये तो तु बता तेरा तेली मसान कहां है अभी। कल भेजा था वापस नही गया तेरे पास ना। 🤣🤣🤣🤣🤣 और जोर जोर से हंस पडा।
संजय के माथे पर पसीने आ गये।
शालिनी – तुझे क्या लगा तु मुझे बांध लेगा। अरे चल निकल । तेरे जैसे छतीस अघोरी रोज खेलाता हूं मैं। तु यहां आया नही है रे लाया गया है 😡😡😡🤣🤣🤣
अब तो संजय के साथ साथ घरवाले भी ठीठक गये। यह मामला जो भी सुलझाने आ रहा है उसके ऊपर यह शक्ति भारी पड़ रही है। 4 तो ऐसे ही लौट गये। संजय तैयारी के साथ आया लेकिन वह भी घिर चुका था ब्रह्मपिशाच के प्रपंच में। मामला पकड़ में आ ही नही रहा था। निराशा के बादल उमड़ पडे़।
संजय ने आवाहित देवता के मंडल में पंच कपूर प्रज्जवलित की और फिर सभी को एक कमरे में जाने बोला। कमरे को अभिमंत्रित राई और भस्म से कीलित कर सुरक्षित किया तथा केवल देवराज को लेकर घर के बाहर गया। इधर शालिनी पिशाच के उग्रता सह ना पाने के वजह से बेसुध पड़ गयी।
घर से बाहर जाकर संजय ने मुख्य द्वार के पास धार दिया और अपने एक अघोर सेवडा़ का आवाहन किया।
देवराज को कहा की तुम अभी जाकर पीपल के 7 पत्ते लाओ। और वापस आकर गाडी़ तैयार करो मुझे अभी ही वापस जाना होगा। यह बोलकर संजय ने सेवडे़ को देवराज के साथ जाने का आदेश दिया।
इधर संजय ने शक्ति अजमाईस कर परख लिया था की यह चीज क्या है। वहां सभी को लग रहा था कि वास्तव में संजय के पास कोई रास्ता नही बचा है। लेकिन संजय की आंखों में अलग ही चमक थी। वह मन ही मन कुछ विशेष तैयारी कर चुका था। जो सोचकर वह आया था वह भुल कर चल पडा़ किसी और राह पर।
जहां शालिनी बेसुध पडी़ हुई थी वहां पहुंच कर उसने मंडल के रक्षकों को विसर्जित किया तथा मंडल भंग कर डाला। बंधन किये गये शालिनी को मुक्त किया तथा दंड को धार देकर शांत किया।
गंगाजल और तुलसी लेकर कुछ मंत्र बुदबुदाते हुये संजय ने शालिनी पर छिड़का। वह उठ बैठी।
तब तक देवराज पत्ते लेकर आ गया। शालिनी को सामान्य होकर बैठे देख थोडा़ आश्चर्य हुआ उसे पर वह चुप रहा।
संजय ने पत्ते लिये और उसे गंगाजल से धोकर उसपर गोरोचन से अलग अलग सात चिन्ह बनाये फिर सप्तश्रृंगी दुर्गा के सात अलग अलग मंत्रों से उसको अभिमंत्रित किया।
वास्तव में यह तंत्र का एक आकर्षण प्रयोग था। पर यह सामान्य आकर्षण नही बल्कि बंधन हेतु किये जाने वाला प्रयोग था।
एक मिट्टी के कलश को धोकर उसमें पवित्र अष्टगंध चंदन लकडी़ इत्यादि डालकर फिर एक जनेऊ डाला गया संजय के द्वारा और फिर पीपल के सातों पत्तों को एक एक कर फट्कार युक्त मंत्र के साथ शालिनी के शीश पर लगाकर कलश में डालने लगा। अंतिम पत्ता डालने के साथ ही ब्रह्म पिशाच कलश में आबद्ध हो चुका था और शालिनी का शरीर पिशाच के प्रभाव से मुक्त हालांकि पैशाचिक अंश का प्रभाव अभी रहने वाला था।
संजय ने ढक्कन लगाकर उसपर सफेद कपडे़ से कसकर बांध दिया। पुनः अभिमंत्रित रक्षासुत्र से 11 बार लपेटकर उसे पुरा कीलित कर सुरक्षित किया।
अब संजन ने पहले गोबर के कंडे सुलगाकर विशेष द्रव्यों को धूपित करके पुरे घर को गोरख कील के द्वारा बांध दिया। तथा सभी सदस्यों को रक्षासुत्र द्वारा रक्षित कर उसी समय देवराज और उसके साथी सहित अपने स्थान की ओर प्रस्थान कर गया।
जाते जाते शालिनी के हेतु यह कह गया की इसे जितना ज्यादा हो नमक चीनी का घोल पिलाओ। और सुबह सवेरे स्नान इत्यादि के पश्चात यह कवच धारण करवा देना सब।
मैं तीन दिन बाद पुनः वापस आऊंगा तब इस समस्या के वास्तविक जड़ तक चलेंगे।
अभी तक यह मामला किसी के भी समझ में नही आ रहा था। केवल यही पकड़ में आया था कि ब्रह्मपिशाच का प्रभाव है बस।
यह घटनाक्रम जैसे जैसे घटित हुई है ठीक उसी क्रम में मैं आप प्यारे पाठकों के हेतु लिख रहा हूं ताकी आप सब इस घटना के पात्रों की वास्तविक स्थिति का अनुभव लेते चलें।यह सत्य तंत्र घटना का प्रकाशन गृहस्थ तंत्र के द्वारा रूद्रांश जी कर रहे हैं,किसी भी प्रकार से इन घटनाओं को बिना लिखित आदेश यहां से कॉपी करके कहीं और कोई प्रकाशित करेगा तो उन पर कानुनी कारवाई की जा सकती है।
जब कोई भी नकारात्मक शक्ति किसी के शरीर पर आ जाती है तो उससे प्रभावित व्यक्ति की प्राण ऊर्जा को वह ग्रहण करने लगती है जिसके कारण पीडित शरीर में विभिन्न परेशानियां उत्पन्न हो जाते हैं। शालिनी लगभग दो महीने से इस पीडा़ से गुजर रही थी। अब उसके शरीर में जान लगभग अंश मात्र बचा था। शरीर का रक्त सुख चुका था। आखों में रक्त की कमी साफ दिखती थी।
संजय के तीव्र प्रयोगों की मार शालिनी के शरीर को भी अत्यंत प्रभावित करती जिसके कारण कुछ अनहोनी घटीत हो सकती थी, इसी कारण संजय ने इसके शरीर पर जोर जबरदस्ती करना उचित ना समझा। उसने सप्तश्रृंगी विद्या के अचूक प्रयोग द्वारा बांध कर ब्रह्म पिशाच को अपने तंत्र साधना स्थली पर ले जाने का निर्णय लिया। और सोचा की वहा इस पिशाच की शक्ति भी कम होगी तथा तथ्य भी जल्द पता चलेंगे।
जाने से पहले शालिनी को उसकी मां के साथ अगले ही दिन घर वापस लौट जाने को निर्देशित किया और कहा की इस समस्या का निराकरण आपके ही घर से होगा इसलिये कल ही लौट जायें सीवान।
रात्रि के 3 बजे स्थान पर पहुंच कर उसने देवराज और उसके मित्र को विदा किया तथा स्वयं अपने साधना स्थली में प्रवेश कर कलश को एक ओर सुरक्षित रख दिया।
अब करना था अगले दिन उस पिशाच को अपने तंत्र विद्या से सदैव के लिये बंधित या सब कुछ जानकर पलटना था शत्रु के अभिचार को।
मुक्ति हेतु कार्य करना होगा, थान स्थान देकर पूजवाना होगा या फिर तंत्र पलट कर पुनः बंधन, यह सब विचार संजय के मस्तिष्क में तेजी से घुम रहे थे।
जानिये अगले भाग में की कैसे और क्या किया संजय ने ब्रह्म के साथ। शालिनी ठीक हुई या कुछ हुआ उसके साथ।
अगला भाग शीघ्र ही…