64 योगिनियों का यह विशेष विधान अगर प्रत्येक घर की प्रत्येक स्त्री कर ले कन्या कर ले तो भाई उनके जीवन में कोई भी आपदा विपदा आयेगी तो भगवती की योगिनी प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष रूप से प्रकट हो के अवश्य ही उस विपदा का हरण कर लेंगे। अगर उन्हें अपने इस अनुष्ठान पर और भगवती के स्वरूपों पर विशेष आस्था हो तो तो उसके ऊपर आज हम लोग विशेष रूप से चर्चा करेंगे। तीन चीज का अभ्यास कर लीजिए। ये स्त्री पुरुष सभी कर सकते हैं। सभी के लिए है। लेकिन विशेष करके अपने घर की स्त्रियों को, कन्याओं को, माताओं को, बहनों को यह अनुष्ठान अवश्य करवाइए अपने जीवन में।
पहला अनुष्ठान तो हम सदैव से कहते आए हैं कि कामाख्या कवच अवश्य करवाइए। ताकि किसी भी अवस्था में चाहे शरीर शुद्ध हो अशुद्ध हो हर अवस्था में कामाख्या कवच का वह स्मरण करके उनका पाठ करके जब वो कंठस्थ हो जाएगा तो अपनी सुरक्षा कर सकती हैं। क्योंकि मंत्रात्मक शक्ति का होना मंत्र शक्ति की उपस्थिति जीवन में अति अनिवार्य है। आपके शत्रु कितने भी प्रबल क्यों ना हो बड़ा से बड़ा गज को भी तंत्र शक्ति के द्वारा धराशाह किया जा सकता है।
इसलिए मंत्र बल से संपन्न होना आज के समय में प्रत्येक सनातनी स्त्री के लिए कन्या के लिए अति अनिवार्य है। तो कामाख्या कवच का अनुष्ठान कर लीजिए।
दूसरा है तंत्रोक्त रात्रिसक्त अथवा तंत्रोक्त देवी सूक्त। इन दोनों के द्वारा भगवती का प्रबोधन किया जाता है, आवाहन किया जाता है। या देवी सर्वभूतेषु शक्ति रूपेण संस्थिता – यह जो मंत्र आदि है जो कि श्री दुर्गा सप्तशती में पांचवे अध्याय में है जिसमें देवताओं ने भगवती का आवाहन किया है। भगवती कौशिकी प्रकट हुई है।
प्राण प्रतिष्ठा के लिए भगवती की शक्तियों के आवाहन के लिए आपको अगर आप तंत्र क्षेत्र में जा रहे हैं जा रही हैं अथवा आप साधक हैं साधिका है तो यह सूक्त बड़ा अनिवार्य है ये कंठस्थ होना चाहिए अथवा इसका आपको अभ्यास होना चाहिए जब चाहे तब आप इसका पाठ कर सकें।
तीसरा है भगवती के 64 योगिनियों के नामावली जिसमें कि अगर आप त्रिपुर सुंदरी मां भगवती के 64 योगिनियों के नामावली का कंठस्थ कर लेती है और उसका अनुष्ठान कर लेती है तो अति उत्तम है। तो पहले इन तीनों का पाठ करने का अभ्यास कर लीजिए और उसके पश्चात इसका अनुष्ठान कीजिए।
कैसे अनुष्ठान करेंगे? तो किसी भी नवरात्र में या किसी भी कृष्ण पक्ष या शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि से लेकर चतुर्दशी तक का यह अनुष्ठान कीजिए। नवरात्र में पूरे नौ दिन का अनुष्ठान कीजिए। आप कलश स्थापना करें अथवा ना करें। व्रत में रहते हो या ना रहते हो लेकिन इसका अनुष्ठान आप अपने सुविधा अनुसार कर सकते हैं। केवल आपको इसका उच्चारण का अभ्यास पहले से कर लेना है ताकि अनुष्ठान के समय में आपको कोई दिक्कत ना हो। आप नाम का उच्चारण ही उस समय नहीं कर पा रही हैं या कर पा रहे हैं तो यह दिक्कत वाला विषय होगा। तो पहले अभ्यास कर लीजिएगा सारा।
अब किस प्रकार से करना है? तो अपने समक्ष भगवती का विग्रह छायाचित्र अथवा कलश जो आप स्थापित करते हो वह कर लीजिए। रख लीजिए। पहले से उपस्थित है तो उन्हीं पे आपको करना है। कम से कम आपके पास में तीन रक्त पुष्प अवश्य होने चाहिए। बिल्कुल सामान्य बता रहे हैं। कोई बहद विधि विधान के साथ नहीं। एक कर्म साक्षी दीपक रखिएगा और लाल वस्त्र हो, लाल आसन हो, उत्तर की दिशा सर्वश्रेष्ठ है या पूर्व की दिशा भी सर्वश्रेष्ठ है। यही दो दिशा होनी चाहिए। दक्षिण आदि में पश्चिम आदि में मत कीजिएगा। सर्वप्रथम गुरु गणपति स्मरण कर लीजिए।
भैरव जी का स्मरण कर लीजिए और उसके पश्चात कुल देवी देवताओं का स्मरण कर लीजिए। चौखट का पूजन कर लीजिए। चौखट पे एक दीप प्रज्वलित कर दीजिए। पुष्प आदि चढ़ा दीजिए। भगवान नरसिंह के नाम से अपने आसन पर बैठकर के आचमन आदि करके और आरंभिक जो विधिविधान होता है उसे करने के पश्चात सबसे पहले एक रक्त पुष्प लेकर के भगवती का आवाहन कीजिए। 64 योगिनी सहित भगवती कामाख्या का आवाहन कीजिए। जो विंध्य पर्वत पर विराजमान मां भगवती महा त्रिपुर सुंदरी है वही भगवती षोडशी के रूप में भगवती कामाख्या के रूप में कामाख्या में नीलांचल पर्वत पर विराजमान है सभी स्वरूप यहां पर बिल्कुल सबसे उच्चतम स्वरूप है भगवती कामाख्या का मां षोडशी के रूप में 10 महाविद्याओं की उपस्थिति जो नीलांचल पर्वत पर है उसमें आप देखिएगा तो भगवती षोडशी भगवती मातंगी और भगवती कमला एक ही साथ विराजमान है कामदेव जो गुफा निर्मित किए थे उस गुफा के भीतर जो मंदिर निर्मित किए थे उसके भीतर जो गुफा है वहां पर तो भगवती कामाख्या के रूप में ही विराजमान है। इसीलिए हम बार-बार कह रहे हैं कि भगवती त्रिपुर सुंदरी की 64 योगिनी का ही आप विशेष पूजन करें क्योंकि आप नाम मात्र से पूजन करेंगे। इसमें दीक्षा हो ना हो कोई दिक्कत नहीं है।