साधना के स्थलों को जो वन क्षेत्र में स्थित रहते थे धीरे-धीरे प्लाटिंग करके बेच कर हाउसिंग सोसायटी स्वतंत्र घर आदि बनवा दिया गया है। ऐसे स्थानों पर रहने वालों में से जिनका उस स्थान की शक्तियों के साथ दैविक सामंजस्य (कुलशक्ति व साधना) बन गया उनकी तो उन्नति है किंतु अधिकांश स्थानों पर या तो विध्वंसक परिणाम अथवा मध्यस्थता यही दोनों होती है। मध्यस्थता आगे चलकर फिर विनाश करती है क्योंकि अगली पीढ़ी कहीं ना कहीं उसे अंधविश्वास का नाम देकर पुराने स्थापित रिवाजों को लात मार देता है।
मेरे निज अनुभव में भी ऐसे दिव्य स्थान रह चुकें हैं। एक स्थान ऐसा था पहाड़ी पर जहां जल का दिव्य स्तोत्र था, छोटा सा झरना , बहुत ही शुद्ध जल बहता वहां एक अद्भुत सर्प शक्ति विराजमान थी। कोई पुजता नहीं था लेकिन अगर आप साधक वर्ग के हों तो उन स्थानों को उपेक्षित नहीं कर सकतें। बिना किसी कामना के दीपावली होली आदि पर उनको पुजा दे आतें वे प्रसन्न हो जातें। अवश्य उनका आशीष जीवन में रहा है। कालांतर में भू माफिया उस जगह को अतिक्रमित की। उस झरने को बंद करने के लिए वहां शहर के कचड़े को फेंका गया। कौन मना करता। वन विभाग तो बिक चुका था। सबकी मिली भगत थी। जब स्थान दुषित हुआ तब स्वप्न में बुजुर्ग दिव्य साधु जो भव्य श्वेत प्रकाश से प्रस्फुटित थे को रोते बिलखते देखा, ऐसा ही स्वप्न अलग अलग प्रकार से बहुत बार आया। हृदय क्षोभित हो उठा। समझ आ रहा था की वो कौन हैं। बहुत भावुकता और विलाप के भाव से ही शिव पूजन के समय उनसे प्रार्थना किया की आप मुझे आदेश दीजिए मैं आपके निमित्त क्या करूं जो आप पुनः प्रसन्न होयेंगे। कोई संकेत नहीं मिला। वे उग्र नहीं थे। सौम्य व आशीर्वाद देने वाले दिव्य नाग देवता थे। श्रावण की नागपंचमी को स्वप्न में आदेश किये की इस विधान से मुझे चिताभूमि के नाग क्षेत्र में पहुंचा दो, मैं अपने लोक को प्रस्थान करुंगा। निद्रा टुटने पर हृदय स्वतः व्यथित था।
विधान का पालन हुआ। बताये गये समय पर चिताभूमि थपर स्थित भगवती सती के हृदयपीठ पर विराजमान भगवान शिव के महा ज्योतिर्लिंग वैद्यनाथ धाम के नाग पीठ पर उनके निमित्त समस्त विधानों को पूर्ण किया गया। हृदय यह करके शांत तो हुआ पर किसी के जाने की पीड़ा आज भी ज्वलंत है। बहुत लोक परलोक के पुण्य से दैविक आत्मियता किसी मनुष्य को जगदंबा देतीं हैं। यह हर दुसरे के समझने का विषय नहीं ना कोई समझ सकता है। विछोह की पीड़ा तो सदैव है और रहेगी। हां यह अवश्य है की आज भी उनका आशीर्वाद व वात्सल्य का आभास होता है जब सांसारिक ताप से शरीर व हृदय अत्यंत पीड़ित होता है। सत्य तो यह है की मैं उनका नाम भी भुल चुका हूं (समय पर नहीं आती स्मृति में ऐसे लिख रखा है – देव चित्तावर नाम था तथा उनकी कथा भी बहुत बाद साधना पथ पर चलने के क्रम में कैसे क्या हुआ गृहस्थ तंत्र ग्रंथ आदि में भविष्य में अवश्य लिखेंगे) पर जो एकाध बार उनके दिव्य क्षणिक दर्शन हुयें हैं , आज भी नित्य रुद्राभिषेक के वासुकी ध्यान में स्वरुप तो वही स्मृति में रहती है।
मेरे लिए वह आज भी वही भोले से शांत कृपाकारी स्वरुप की स्मृति हैं जो वह उस काल में थे।
यह 2016 में लिखे थे अपने स्मृतिका में। आज मिला तो पुनः आप सभी के समक्ष उद्धृत कियें।
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